Natural Treatment


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हमारा शरीर पंचतत्वों के योग से बना है। हमारे इस स्थूल भौतिक शरीर में वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश एवं जल रूपी पंचतत्व समाहित हैं। जब तक शरीर में इन पांच तत्वों की साम्यता रहती है, तब तक शरीर स्वस्थ है। किसी भी एक तत्व के घटने या बढ़ने पर शरीर असहाय हो जाता है, रोगग्रस्त हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में पंचतत्वों में आए बदलाव को पुनः सुधारकर शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा यानी नेचुरोपैथी पद्धति में प्राकृतिक भोजन, विशेषकर ताजे फल तथा कच्ची व हलकी पकी सब्जियाँ विभिन्न बीमारियों के इलाज में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।प्राकृतिक चिकित्सा निर्धन व्यक्तियों एवं गरीब देशों के लिये विशेष रूप से वरदान है।

संसाधनों से समृद्ध प्रकृति से निकटता के जरिए आप सेहतमंद बने रह सकते हैं। तनाव होने पर डॉक्टर भी प्राकृतिक स्थल पर घूमने या बागवानी की सलाह देते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा उपचार के लिए पंच तत्वों आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी को आधार मानकर चिकित्सा सम्पन्न की जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति पंच महाभूतत्वों (मिट्टी, पानी, धूप, हवा व आकाश) पर आधारित है। डॉक्टर से सलाह लेकर घर पर ही इलाज संभव है। इसके अंतर्गत जोड़ों का दर्द, ऑर्थराइटिस, स्पॉन्डलाइटिस, सियाटिका, पाइल्स, कब्ज, गैस, एसिडिटी, पेप्टिक अल्सर, फैटी लीवर, कोलाइटिस, माइग्रेन, मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, श्वांस रोग, दमा, ब्रॉनकाइटिस, सीओपीडी (क्रॉनिक, ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) व त्वचा संबंधी रोगों का सफलतम उपचार होता है।

मड बाथ, मिट्टी की पट्टी, वेट शीट पैक (गीली चादर लपेट), हॉट आर्म एंड फुट बाथ (गर्म पाद स्नान), सन बाथ (सूर्य स्नान), कटि स्नान, स्टीम बाथ, एनीमा, स्पाइन स्प्रे बाथ, मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग के अलावा उपवास, दूध कल्प, फलाहार, रसाहार, जलाहार द्वारा भी इलाज किया जाता है।

इसके अन्तर्गत रोगों का उपचार व स्वास्थ्य-लाभ का आधार है – ‘रोगाणुओं से लड़ने की शरीर की स्वाभाविक शक्ति’। प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत अनेक पद्धतियां हैं जैसे – जल चिकित्सा , सूर्य चिकित्सा, उपवास चिकित्सा, मृदा चिकित्सा आदि।

प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त

(1) कोई हानि नहीं करना
(2) रोग के कारण का इलाज करना (न कि लक्षण का)
(3) स्वस्थ जीवन जीने तथा रोग से बचने की शिक्षा देना (रोगी-शिक्षा का महत्व)
(4) व्यक्तिगत इलाज के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को रोगमुक्त करना (हर व्यक्ति अलग है)
(5) चिकित्सा के बजाय रोग की रोकथाम करने पर विशेष बल देना
(6) शरीर की जीवनी शक्ति (रोगों से लड़ने की क्षमता) को मजबूत बनाना (शरीर ही रोगों को दूर करता है, दवा नहीं)

व्यवहार में प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है, अपितु यह एक जीवन पद्धति है। इसे बहुधा ‘औषधिविहीन उपचार पद्धति’ कहा जाता है। यह मुख्य रूप से प्रकृति के सामान्य नियमों के पालन पर आधारित है। जहाँ तक मौलिक सिद्धांतो का प्रश्‍न है, इस पद्धति का आयुर्वेद से निकटतम सम्बन्ध है।

प्राकृतिक चिकित्सा के समर्थक खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों, शुद्धि कर्म, जल चिकित्सा, ठण्डी पट्टी, मिटटी की पट्टी, विविध प्रकार के स्नान, मालिश्‍ा तथा अनेक नई प्रकार की चिकित्सा विधाओं पर विश्‍ोष बल देते है।

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार, “केवल भोजन ही चिकित्सा है”, कोई बाहरी दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। स्वयं के आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार प्रार्थना करना भी उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आहार चिकित्सा

इसके अनुसार, भोजन प्राकृतिक रूप में लिया जाना चाहिए। ताज़े मौसमी फल, ताज़ी हरी पत्तेदार सब्जियां और अंकुरित भोजन बहुत ही लाभकारी हैं। ये आहार मोटे तौर पर तीन प्रकार में विभाजित हैं जो इस प्रकार हैं:

एलिमिनेटिव (निष्कासन हेतु) आहार:
तरल-नींबू, साइट्रिक रस, नर्म नारियल का पानी, वनस्पति सूप, छाछ, गेहूं की घास का रस आदि।

सुखदायक आहार:
फल, सलाद, उबली हुई/ वाष्पीकृत सब्जियां, अंकुर, सब्ज़ी की चटनी आदि।

रचनात्मक आहार:
पौष्टिक आटा, अप्रसंस्कृत चावल, थोड़ी सी दालें, अंकुर, दही आदि।

क्षारीय होने के नाते, ये आहार स्वास्थ्य में सुधार करने में, शरीर की सफ़ाई और बीमारी के लिए प्रतिरक्षा के प्रतिपादन में मदद करते हैं। इस लिहाज़ से भोजन का उचित संयोजन आवश्यक है। स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमारा भोजन 20% अम्लीय और 80% क्षारीय होना चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए संतुलित भोजन नितान आवश्यक है। प्राकृतिक चिकित्सा में भोजन को दवा के रूप में माना जाता है.

उपवास चिकित्सा

उपवास (फास्ट) मुख्य रूप से स्वेच्छा से कुछ समयावधि के लिए कुछ या सभी भोजन, पेय, या दोनों से परहेज़ करना है। यह शब्द पुरानी अंग्रेजी से व्युत्पन्न ‘फीस्टन’ से निकला है जिसका मतलब है, उपवास करना, देखना और सख्त होना। संस्कृत में ‘व्रत’ का अर्थ है ‘दृढ़ संकल्प’ और ‘उपवास’ का अर्थ है ‘ईश्वर के पास’। उपवास संपूर्ण हो सकता है, आंशिक और लंबे समय तक का हो सकता अथवा यह कुछ अवधि में रुक-रुक कर हो सकता है। स्वास्थ्य संरक्षण के लिए एक उपवास उपचार का महत्वपूर्ण साधन है। उपवास में, मानसिक तैयारी एक आवश्यक पूर्व शर्त है। लंबे समय का उपवास केवल एक सक्षम प्राकृतिक चिकित्सक के पर्यवेक्षण के अधीन किया जाना चाहिए।

उपवास की अवधि रोगी की उम्र, बीमारी की प्रकृति और पहले से इस्तेमाल की गई दवाओं के प्रकार पर निर्भर करती है। कभी-कभी कुछ समय दो या तीन दिन के उपवास की एक श्रृंखला शुरू करने और धीरे-धीरे एक या दो दिन से प्रत्येक उपवास की अवधि बढ़ाने की सलाह दी जाती है।

उपवास पानी, रस, या कच्ची सब्जियों के रस के साथ हो सकता है। सबसे अच्छी, सुरक्षित और सबसे प्रभावी विधि नीबू के रस से उपवास है। उपवास के दौरान शरीर जमा अपशिष्ट की भारी मात्रा को जलाकर निकालता है। हम क्षारीय रस पीकर इस सफाई की प्रक्रिया में मदद कर सकते हैं। रसों में शर्करा ह्रदय को मजबूत करती है, इसलिए रस द्वारा उपवास, उसका सबसे अच्छा तरीका है। सभी रस, पीने से तुरंत पहले ताजा फल से तैयार किए जाने चाहिए। डिब्बाबंद या जमे हुए रस का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। एक एहतियाती उपाय है, जो उपवास के सभी मामलों में किया जाना चाहिए, एनीमा द्वारा उपवास की शुरुआत में आंत को पूरी तरह खाली करना ताकि मरीज को गैस या घटक शरीर में शेष अपशिष्ट से उत्पन्न अपघटित पदार्थ से परेशानी नहीं हो। उपवास की अवधि के दौरान एनिमा कम से कम हर दूसरे दिन लिया जाना चाहिए। कुल तरल पदार्थ सेवन लगभग छह से आठ गिलास होना चाहिए। उपवास के दौरान शरीर में संचित जहर और विषाक्त अपशिष्ट पदार्थों को नष्ट करने की प्रक्रिया में बहुत ऊर्जा खर्च होती है। इसलिए यह अत्यंत महत्व का है कि उपवास के दौरान रोगी को ज़्यादा से ज़्यादा सम्भव शारीरिक और मानसिक विश्राम प्राप्त हो।

उपवास की सफलता काफी हद तक इस पर निर्भर करती है कि उसे कैसे तोड़ा जाता है ? उपवास तोड़ने के मुख्य नियम हैं: आवश्यकता से अधिक न खाएं, भोजन को धीरे-धीरे चबा कर खाएं और सामान्य आहार के लिए क्रमिक बदलाव के लिए कई दिन लगाएं। उपवास चिकित्सा किसी योग्य चिकित्सा की देख रेख में ही करें।

वायु उपचार

ताजा हवा अच्छे स्वास्थ्य के लिए सबसे जरूरी है। वायु स्नान के माध्यम से वायु चिकित्सा का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को दैनिक 20 मिनट या यदि संभव हो तो उससे अधिक समय के लिए वायु स्नान करना चाहिए। यह अधिक फायदेमंद है जब सुबह ठंडी रगड़ और व्यायाम के साथ संयुक्त रूप से किया जाए। इस प्रक्रिया में, व्यक्ति को रोज़ाना कपड़े उतारकर या हल्के कपड़े पहनकर एकांतयुक्त साफ स्थान पर चलना चाहिए, जहां पर्याप्त ताजा हवा उपलब्ध हो।

मालिश चिकित्सा

मालिश भी प्राकृतिक चिकित्सा है जो अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक साधन है। मालिश हाथ, उंगलियों, कोहनी, घुटनों, बांह की कलाई , पैर ,पीठ ,सीना अर्थात सम्पूर्ण शरीर की जा सकती है। यह रक्त परिसंचरण में सुधार और शारीरिक अंगों को मजबूत बनाने का काम करती है। सर्दियों के मौसम में, पूरे शरीर की मालिश के बाद सूर्य स्नान अच्छी तरह से स्वास्थ्य और शक्ति के संरक्षण के अभ्यास के रूप में जाना जाता है। यह सभी के लिए फायदेमंद है। यह मालिश और सूरज की किरणों की चिकित्सा के संयुक्त लाभ प्रदान करता है। बीमारी की स्थिति में, आवश्यक उपचारात्मक प्रभाव मालिश की विशिष्ट तकनीक के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। मालिश उनके लिए एक विकल्प है जो व्यायाम नहीं कर सकते हैं। व्यायाम के प्रभाव मालिश से प्राप्त किए जा सकते हैं। सरसों तेल, तिल का तेल, नारियल तेल, जैतून का तेल, खुशबूदार तेल आदि जैसे विभिन्न तेलों का स्नेहक के रूप में उपयोग किया जाता है, नीम के पत्तों का पाउडर और गुलाब की पंखुड़ियों का भी मालिश के लिए स्नेहक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है , जो उपचारात्मक प्रभाव देते हैं।

सूरज की किरणों द्वारा चिकित्सा

सूर्य के प्रकाश के सात रंगो के द्वारा चिकित्सा की जाती है। यह चिकित्‍सा शरीर में उष्‍णता बढ़ाता है। स्‍नायुओं को उत्‍तेजित करना वात रोग, कफ, ज्‍वर, श्‍वास, कास, आमवात पक्षाघात, ह्रदयरोग, उदरमूल, मेढोरोग, वात जन्‍यरोग, शोध चर्मविकार, पित्‍तजन्‍य रोगों में प्रभावी हैं।

सूर्य चिकित्सा के सिद्धान्त के अनुसार रोगोत्पत्ति का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढना है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार अलग‍-अलग रंगों के अलग-अलग गुण होते हैं। लाल रंग उत्तेजना और नीला रंग शक्ति पैदा करता है। इन रंगों का लाभ लेने के लिए रंगीन बोतलों में आठ-नौ घण्टे तक धूप में पानी रखकर उसका सेवन किया जाता है।
मानव शरीर रासायनिक तत्वों का बना है। रंग एक रासायनिक मिश्रण है। जिस अंग में जिस प्रकार के रंग की अधिकता होती है शरीर का रंग उसी तरह का होता है। जैसे त्वचा का रंग गेहुंआ, केश का रंग काला और नेत्रों के गोलक का रंग सफेद होता है। शरीर में रंग विशेष के घटने-बढने से रोग के लक्षण प्रकट होते हैं, जैसे खून की कमी होना शरीर में लाल रंग की कमी का लक्षण है।
सूर्य स्वास्थ्य और जीवन शक्ति का भण्डार है। मनुष्य सूर्य के जितने अधिक सम्पर्क में रहेगा उतना ही अधिक स्वस्थ रहेगा| जो लोग अपने घर को चारों तरफ से खिडकियों से बन्द करके रखते हैं और सूर्य के प्रकाश को घर में घुसने नहीं देते वे लोग सदा रोगी बने रहते हैं।
जहां सूर्य की किरणें पहुंचती हैं, वहां रोग के कीटाणु स्वत: मर जाते हैं और रोगों का जन्म ही नहीं हो पाता| सूर्य अपनी किरणों द्वारा अनेक प्रकार के आवश्यक तत्वों की वर्षा करता है और उन तत्वों को शरीर में ग्रहण करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
सुबह सबेरे धूप स्नान हृदय को स्वस्थ रखने का कारगर तरीका बताया गया है। उसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति सूर्योदय के समय सूर्य की लाल रश्मियों का सेवन करता है उसे हृदय रोग कभी नहीं होता।
सूर्य प्रतिदिन रश्मियों का सेवन करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है। सूर्य की रोग नाशक शक्ति ये कि सूर्य औषधि बनाता है, विश्व में प्राण रूप है तथा अपनी रश्मियों द्वारा जीवों का स्वास्थ्य ठीक रखता है, किन्तु ज्यादातर लोग अज्ञानवश अन्धेरे स्थानों में रहते है और सूर्य की शक्ति से लाभ नहीं उठाते |
सूर्योदय के समय सूर्य की लाल किरणों के प्रकाश में खुले शरीर बैठने से हृदय रोगों तथा पीलिया के रोग में लाभ होता है। प्राकृतिक चिकित्सा में आन्तरिक रोगों को ठीक करने के लिए भी नंगे बदन सूर्य स्नान कराया जाता है।
आजकल जो बच्चे पैदा होते ही पीलिया रोग के शिकार हो जाते हैं उन्हें सूर्योदय के समय यदि सूर्य किरणों में लिटाया जाये तो अल्ट्रा वायलेट किरणों के सम्पर्क में आने से उनके शरीर के पिगमेन्ट सेल्स पर रासायनिक प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और बीमारी में लाभ होता है।
ये तो आप सभी को मालूम है कि सूर्य की किरणों में सातो रंग होते हैं l इन सात रंगों की अपनी−अपनी विशेषताएं हैं जिनके आधार पर इन्हें विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए चुना जाता है lसूर्य चिकित्सा करने से पहले रंगों की प्रकृति तथा गुणों की जानकारी होना आवश्यक है अन्यथा रोगी को अभीष्ट लाभ नहीं मिल पाता।
पहला प्रमुख रंग नारंगी होता है। सूर्य की सात किरणों में यह एक स्वतंत्र किरण होती है परन्तु यह रंग लाल और पीले रंग को मिलाने से बनता है। नारंगी रंग का स्वभाव गर्म तथा उत्तेजक होता है। चूंकि यह रंग लाल और पीले का मिश्रण होता है इसलिए इसमें दोनों के गुण होते हैं। यह पीले रंग से अधिक गर्म तथा लाल रंग से कम गर्म होता है।
इसकी प्रकृति गर्म होने के कारण यह शीत के प्रकोप तथा कफजनित रोगों के निदान के लिए बहुत उपयोगी है। यह शरीर में रक्त संचार बढ़ाता है। कमजोरों तथा वृद्धों के लिए यह शक्तिवर्धक टॉनिक का काम करता है। पेट, यकृत, गुर्दे तथा आतों की कमजोरी दूर करने के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी है। इस रंग के प्रयोग से पाचन शक्ति बढ़ती है। यह रंग गतिहीन तथा निर्बल अंगों को बल प्रदान कर उनमें चेतना का संचार करता है। नारंगी रंग का सबसे आश्चर्यजनक गुण यह है कि यह आयोडीन की कमी को भी दूर करता है।
यह रंग कफ वाली खांसी, इन्फ्लूएंजा, निमोनिया, बुखार, क्षय रोग, गैस, फेफडे़ के रोग, स्नायु रोग, गठिया, खून में लाल रक्त कणों की कमी आदि में विशेष रूप से लाभकारी है। स्नायु दुर्बलता, पक्षाघात, हृदय रोग, सांस से संबंधित बीमारियां, बदहजमी, भूख बढ़ाने, मोटापा घटाने तथा शारीरिक दुर्बलता को मिटाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। स्त्रियों के मासिक धर्म संबंधी कष्टों को भी यह दूर कर सकता है।
नारंगी रंग का नियमित प्रयोग करने से मानसिक शक्ति का विकास होता है। इससे बौद्धिक विकास होता है और व्यक्ति में अद्भुत साहस का संचार होता है तथा व्यक्ति जोखिम उठाने को तैयार होता है। नारंगी रंग का सेवन करते हुए व्यक्ति का मानसिक दशा पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है क्योंकि इससे इच्छा शक्ति प्रबल होती है जिससे महत्वाकांक्षा रखने वाले व्यक्ति अनावश्यक रूप से अहंकारी हो सकते हैं।
दूसरा आवश्यक रंग हरा है।सूर्य की किरणों में हरा एक स्वतंत्र रंग होता है। यह रंग जीवन और खुशहाली का प्रतीक है। हरा रंग ठंडी प्रकृति का तथा रक्त शोधक होता है। यह शरीर में एकत्रित विषाक्त पदार्थों को नष्ट करता है। गठिया रोग को कम करने में इस रंग का विशेष महत्व है। यह पेट संबंधी रोगों को नष्ट करने में सहायक होता है। शरीर में मांस पेशियों का निर्माण कर उन्हें शक्ति प्रदान करता है। यह रंग संक्रामक जीवाणुओं को नहीं पनपने देता। अपनी ठंडी प्रकृति के कारण यह रंग दिमाग ठंडा रखता है और मस्तिष्क को बल देता है। चर्म रोगों में भी हरा रंग विशेष रूप से लाभकारी है इसका नियमित प्रयोग त्वचा की रौनक बढ़ाता है। आंखों की सभी बीमारियों के निदान में भी हरे रंग का प्रयोग किया जाता है। इस रंग का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि यह शरीर के समस्त क्रियाकलाप तथा तापमान को संतुलित रखता है।
टाइफाइड, मलेरिया, लीवर और गुर्दों की सूजन, सिरदर्द, बदहजमी, कब्ज, चेचक, फुंसी, दाद, खाज, मिर्गी, सूखी खांसी आदि रोगों के उपचार में हरे रंग की दवा बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। हिस्टीरिया तथा पथरी के निदान में भी इसका प्रयोग होता है। हरे रंग की दवा उच्च रक्तचाप को भी नियंत्रित करती है कैंसर जैसे घातक रोगों का आराम भी इसके द्वारा संभव है।
नीले रंग की प्रकृति शीतल होती है lइस रंग के पानी का प्रयोग कीटाणुनाशक तथा वायरसरोधी होता है। इस रंग में जीवाणु ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकते। नीले रंग का प्रयोग मुंह में छाले, गला तथा गले के ऊपरी भाग (सिर तक) के रोगों के निदान के लिए किया जाता है। शरीर के किसी हिस्से में पस बनने की क्रिया को रोकने में इस रंग के आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं। गर्मी के मौसम में उत्पन्न अनेक रोगाणुओं को भी यह रंग नष्ट कर देता है। यदि रोगी को बहुत तेज बुखार हो तो नीले रंग के विभिन्न प्रयोग फायदेमंद साबित होते हैं। सिरदर्द, लू लगना, आंतरिक रक्त स्राव, उच्च रक्त चाप, दांत दर्द, मसूढे फूलना, टॉसिल, डायरिया, मुंह के छाले, पायरिया, हैजा जैसे रोगों में भी नीले रंग की दवा तुरन्त लाभ पहुंचाती है।
हिस्टीरिया, पागलपन, उन्माद जैसे मानसिक रोगों में भी नीले रंग की दवा के प्रयोग से लाभ होता है। यह रंग फूड पॉयजनिंग होने पर लाभदायक है। कई स्त्री रोगों जैसे श्वेत प्रदर, मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्त स्राव तथा शरीर की जलन मिटाने में इस रंग की दवा का प्रयोग आशातीत लाभ देता है।नीले रंग का प्रयोग मानसिक उत्तेजना मिटाता है। यह रंग व्यक्ति के आध्यामिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। इस रंग का प्रयोग व्यक्ति को एकाग्रचित्त भी बनाता है। नीले रंग का निरन्तर प्रयोग व्यक्ति को उत्तरोत्तर दृढ़ बनाता है जिससे उसमें आत्मविश्वास तथा सत्य बोलने की शक्ति उत्पन्न होती है।

मृदा चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैज्ञानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए मिट्टी-चिकित्सा का उपयोग किया जाता है। मिट्टी, शरीर के दूषित पदार्थों को घोलकर व अवशोषित कर अंततः शरीर के बाहर निकाल देती है। मिट्टी की पट्टी एवं मिट्टी-स्नान इसके मुख्य उपचार हैं। मृदास्नान (मड बाथ) रोगों से मुक्ति का अच्छा उपाय है।

मिट्टी के लाभ

विभिन्न रोगों जैसे कब्ज, स्नायु-दुर्बलता, तनावजन्य सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, मोटापा तथा विशेष रूप से सभी प्रकार के चर्म रोगों आदि में सफलतापूर्वक इसका उपयोग कर जीवन शक्ति का संचार एवं शरीर को कांतिमय बनाया जा सकता है।

रोग चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, मिट्टी उसके विष और गर्मी को धीरे-धीरे चूसकर उस जड़-मूल से नष्ट करके ही दम लेगी। यह मिट्टी की खासियत है।

मिट्टी कैसी हो?

मिट्टी-स्नान के लिए जिस क्षेत्र में जैसी मिट्टी उपलब्ध हो, वही उपयुक्त है लेकिन प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी साफ-सुथरी, कंकर-पत्थर व रासायनिक खाद रहित तथा जमीन से 2-3 फुट नीचे की होना चाहिए। एक बार उपयोग में लाई गई मिट्टी को दुबारा उपयोग में न लें। अगर मिट्टी बहुत ज्यादा चिपकने वाली हो तो उसमें थोड़ी-सी बालू रेत मिला लें। संक्रमण से ग्रस्त तथा अत्यधिक कमजोर व्यक्ति मिट्टी-स्नान न करें। ठंडे पानी से स्नान करने के पश्चात शरीर पर हल्का तेल मल लें।

सूखी मिट्टी स्नान

शुद्ध-साफ मिट्टी को कपड़े से छान लीजिए और उससे अंग-प्रत्यंग को रगड़िए। जब पूरा शरीर मिट्टी से रगड़ा जा चुका हो, तब 15-20 मिनट तक धूप में बैठ जाएं, तत्पश्चात ठंडे पानी से, नेपकीन से घर्षण करते हुए स्नान कर लीजिए।

गीली मिट्टी स्नान

शुद्ध, साफ कपड़े से छनी हुई मिट्टी को रातभर पानी से गलाकर लेई (पेस्ट) जैसा बना लीजिए और पूरे शरीर पर लगाकर रगड़िए तथा धूप में 20-30 मिनट के लिए बैठ जाएं। जब मिट्टी पूरी तरह से सूख जाए तब ठंडे पानी से पूरे शरीर का नेपकीन से घर्षण करते हुए स्नान कर लें।

मिट्टी की पट्टी का प्रयोग

उदर विकार, विबंध, मधुमेह, सिर दर्द, उच्च रक्त चाप ज्वर, चर्मविकार आदि रोगों में किया जाता है। पीड़ित अंगों के अनुसार अलग अलग मिट्टी की पट्टी बनायी जाती है।

वस्ति (एनिमा)

वस्ति के लिये एक पिचकारी का उपयोग किया जाता है।
वस्ति (enima) वह क्रिया है, जिसमें गुदामार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्न द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है। उपचार के पूर्व इसका प्रयोग किया जाता जिससे कोष्ट शुद्धि हो। रोगानुसार शुद्ध जल, नीबू जल, तक्त, निम्ब क्वाथ का प्रयोग किया जाता है।

जल चिकित्सा

मनुष्य−शरीर तीन चौथाई भाग से अधिक जल से ही बना है। हमारे रक्त , माँस, मज्जा में जो आद्रता या नमी का अंश है वह पानी के कारण ही है। मल, मूत्र, पसीना और तरह−तरह के रस, सब पानी के ही रूपान्तर होते हैं। यदि शरीर में पानी की कमी हो जाती है तो तरह−तरह के रोग उठ खड़े होते हैं पानी की कमी से ही गर्मी में अनेक लोग लू लगकर मर जाते हैं। जुकाम में पानी की भाप लेने से बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार सिर दर्द और गठिया के दर्द में भी इस उपचार से निरोगता प्राप्त होती है, शरीर में जब फोड़े फुँसी अधिक निकलने लगते हैं और मल्हम आदि से कोई लाभ नहीं होता तो जलोपचार उनको चमत्कारी ढंग से ठीक कर देता है।

पेट−दर्द होने पर

एलोपैथिक डाक्टर भी रबड़ की थैली या बोतल में गर्म पानी भर कर सेक करवाते हैं। कब्ज के रोग में गर्म पानी पीना बड़ा लाभकारी होता है और जो नित्य प्रति सुबह गर्म पानी नियम से पीते रहते हैं उनका कब्ज धीरे-धीरे अवश्य ठीक हो जाता है।

मनुष्य−शरीर तीन चौथाई भाग से अधिक जल से ही बना है। हमारे रक्त , माँस, मज्जा में जो आद्रता या नमी का अंश है वह पानी के कारण ही है। मल, मूत्र, पसीना और तरह−तरह के रस, सब पानी के ही रूपान्तर होते हैं। यदि शरीर में पानी की कमी हो जाती है तो तरह−तरह के रोग उठ खड़े होते हैं पानी की कमी से ही गर्मी में अनेक लोग लू लगकर मर जाते हैं। जुकाम में पानी की भाप लेने से बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार सिर दर्द और गठिया के दर्द में भी इस उपचार से निरोगता प्राप्त होती है, शरीर में जब फोड़े फुँसी अधिक निकलने लगते हैं और मल्हम आदि से कोई लाभ नहीं होता तो जलोपचार उनको चमत्कारी ढंग से ठीक कर देता है।

रोगों और शारीरिक पीड़ा के निवारण के लिये गर्म पानी का प्रयोग तो साधारण गृहस्थों के यहाँ भी सदा से होता आया है, पर ठंडे पानी के लाभों को थोड़े ही लोग समझते हैं, यद्यपि ठंडा पानी गर्म पानी की अपेक्षा अधिक रोग निवारक सिद्ध हुआ है। ज्वर, चर्म, रोग में ठंडे पानी से भीगी हुई चादर को पूरी तरह लपेटे रहने से आश्चर्यजनक लाभ पहुँचता है। उन्माद तथा सन्निपात के रोगियों के सिर पर खूब ठण्डे जल में भीगा हुआ कपड़ा लपेट देने से शान्ति मिलती है। शरीर के किसी भी भाग में चोट लगकर खून बह रहा हो बर्फ के जल में भीगा हुआ कपड़ा लगाने से खून बहना रुक जाता है। नाक से खून का बहना भी पानी से सिर को धोने तथा मिट्टी के सूँघने, लपेटने से ठीक होता है। इसी प्रकार अन्य अंगों के विकार भी जल के प्रयोग से सहज में दूर हो जाते हैं। जर्मनी के डाक्टर लुई कूने ने अपने ग्रंथ में बहुत स्पष्ट रूप से यह समझा दिया है कि जल−चिकित्सा ही सर्वोत्तम है। उसमें किसी प्रकार का खर्च नहीं है और सादा जल का प्रयोग करने से शरीर में कोई नया विकार भी उत्पन्न होना संभव नहीं है।

स्नान की वैज्ञानिक विधि

स्नान के लिये बहता हुआ साफ पानी सबसे अच्छा होता है। वह न मिल सके तो कुँआ, तालाब आदि का ताजा पानी भी काम दे सकता है। बहते हुये और ताजा पानी में जो प्राण तत्व पाया जाता है वह बर्तनों में कई घंटों तक रखे पानी में नहीं रहता। इसलिये अगर रखे हुये पानी से ही काम लेना पड़े तो उसे एक बर्तन से दूसरे बर्तन में बार−बार कुछ ऊँचाई से डालने से उसमें प्राण−शक्ति का संचार हो जाता है। स्नान का पानी सदैव ठण्डा ही होना चाहिये, हाँ उसका तापक्रम ऋतु के अनुसार इतना रखा जा सकता है जिसे अपना शरीर सहज में सहन कर सके। अपनी शक्ति से अधिक ठण्डे पानी, से स्नान करना जिससे मन प्रसन्न होने के बजाय संकुचित हो, लाभदायक नहीं होता। इसी प्रकार गर्म पानी से स्नान करना भी हानिकारक है, सिवाय किसी विशेष बीमारी की अवस्था के जिसमें इस प्रकार के स्नान का विधान हो। पानी अधिक ठण्डा जान पड़े तो उसे धूप में रख कर या गर्म पानी मिला कर सहने योग्य बनाया जा सकता है। बहुत ठण्डे पानी में अधिक देर तक स्नान करने से रक्त संचारण क्रिया में बाधा पड़ती है।

स्नान करते समय शरीर को खूब मलना आवश्यक है जिससे मैल छूट कर देह के भीतर की गर्मी को उत्तेजना मिले और रक्त−संचरण ठीक ढंग से होने लगे। इसके लिये शरीर को किसी मोटे और खुरदरे तौलिये से रगड़ना ठीक रहता है। इससे शरीर के रोम कूप भली प्रकार खुल जाते हैं और भीतर का मैल पसीने के रूप में आसानी से निकल सकता है। स्नान में जल्दबाजी न करके समस्त अंगों को भली प्रकार रगड़ना और साफ करना आवश्यक है।

गर्म जल से स्नान भी अगर विधिपूर्वक किया जाय तो विशेष लाभदायक हो सकता है। गर्म जल से शरीर के रोमकूप विकसित होकर फैलते हैं, उनसे मलयुक्त पसीना सहज में निकलने लगता है और भीतर का रक्त ऊपर की तरफ दौड़ने लगता है। इससे शरीर की गर्मी बाहर निकलने लगती है और यही कारण है कि गर्म पानी से स्नान करने के थोड़ी देर बाद अधिक ठण्ड का अनुभव होने लगता है। इसलिये गर्म जल से स्नान करने के बाद तुरन्त ही ठण्डे जल से स्नान करना अनिवार्य है, ताकि ऊपर को दौड़ने वाला रक्त फिर भीतर वापस चला जाय और उसकी गर्मी अधिक मात्रा में बाहर न निकल जाय। इसके लिये फुहारा स्नान (शावर बाथ) सबसे अच्छा रहता है।

उचित रीति से स्नान करने से शारीरिक स्वास्थ्य की वृद्धि होती है और रोगों के आक्रमण का भय बहुत कम हो जाता है। अनेक साधारण रोग तो नियमित स्नान करने से अपने आप मिट जाते हैं। फुहारे के नीचे बैठ कर स्नान करना अधिक सुविधाजनक और शीतल करने वाला होता है। नदी या तालाब में तैर कर स्नान करने से व्यायाम का भी लाभ मिल जाता है और शारीरिक अंग प्रत्यंगों का विकास होता है। वर्षा में मेह के जल से स्नान करने से फुहारा स्नान का−सा आनन्द मिलता है और जल में जो अत्यधिक प्राण−शक्ति होती है उससे बहुत लाभ भी उठाया जा सकता है। पर ऐसा स्नान अपने स्वास्थ्य और शक्ति के अनुसार थोड़े समय तक ही करना चाहिये। कमजोर या अधिक वृद्ध लोगों के लिये अधिक देर तक भीगना ठीक नहीं होता। बीमारों के लिये नित्य स्नान करना आवश्यक है, पर वह बहुत सम्भल कर होना चाहिये। पानी का तापमान ऐसा हो जिससे शरीर पर किसी तरह का खराब असर न पड़े। यदि स्नान की सुविधा न हो तो कपड़े या तौलिया को मामूली पानी में भिगोकर उससे समस्त शरीर को भली प्रकार रगड़ कर पोंछ देना भी काफी लाभदायक होता है। इससे शरीर की गन्दगी दूर हो जाती है और तबियत में ताजगी तथा प्रसन्नता का भाव आ जाता है।

स्नान का एक खास उद्देश्य शरीर को ठण्डा करना भी होता है क्योंकि शरीर के अन्दर जो विजातीय द्रव्य एकत्रित हो जाता है वह गर्मी उत्पन्न करता है। यह विजातीय द्रव्य अधिकाँश में नीचे के भाग में ही एकत्रित होता है इसलिए वैज्ञानिक विधि के अनुसार पहले नीचे के भागों को ही धोना और ठण्डा करना चाहिये। इसके लिए किसी ऐसी टब या नाँद में बैठाकर स्नान किया जाय जिसमें तीन चार इंच पानी भरा हो। इसमें बैठकर पेडू पर खूब छपके मारें और उसे हथेली से रगड़ कर जल को सुखाएं। इसके बाद लोटा−लोटा पानी ऊपर डालकर स्नान करें। यदि नदी तालाब आदि पर स्नान करना हो तो वहाँ डुबकी लेकर स्नान करें। स्नान के पश्चात् बदन को तौलिये से पोंछने के बजाय हथेलियों से पोंछकर ही सुखा दें तो ज्यादा लाभदायक होता है और आनन्द भी मिलता है।

इस तरह के प्राकृतिक स्नान से अनेक प्रकार के शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं और रोगों का भय जाता रहता है। स्त्रियों के लिये ऐसा स्नान उनकी अनेक जननेन्द्रिय सम्बन्धी बीमारियों को दूर करने वाला सिद्ध हुआ है। पुरुषों के भी प्रमेह, स्वप्नदोष, कब्ज, अजीर्ण जैसे रोगों में इसमें धीरे−धीरे बड़ी कमी हो जाती है। इस प्रकार प्राकृतिक स्नान प्रत्येक व्यक्ति के लिए हितकारी है। यों तो इसके सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर सबका साराँश यही है हमारे शरीर में जमा होने वाला विजातीय द्रव्य नीचे के भाग में ज्यादा असर करता है। उसकी हानिकारक गर्मी को शान्त करने के लिए इस प्रकार का स्नान बड़ा लाभकारी सिद्ध होता है।

रोग−निवारण के लिए विशेष स्नान

इस सामान्य स्नान के अतिरिक्त बीमारों और कमजोर स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के कई अन्य स्नान भी बड़े महत्वपूर्ण हैं, जिनसे शीघ्र प्रभाव पड़ता है और बड़े−बड़े रोग थोड़े ही समय में ठीक हो जाते हैं। उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जाता है।

कटि स्नान या हिपबाथ

इस स्नान के लिये एक विशेष बनावट की टब बाजार में बिकती है जिसका पिछला भाग कुर्सी की तरह सहारा लेने के लिये उठा रहता है। दोनों पैर बाहर निकले रहते हैं और सूखे रहते हैं। टब में इतना पानी भरा जाता है कि नाभि के जरा नीचे तक आ जाय। इस प्रकार बैठकर पानी में डूबे शरीर को हथेली से या कपड़े से मलना चाहिये। आरम्भ में पाँच से दस मिनट तक स्नान करना काफी होता है बाद में इस समय को आधा घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। पानी इतना ठंडा होना चाहिए जितना आसानी से सहन कर लिया जाय। यदि रोगी कमजोर हो और मौसम ठण्ड का हो तो उसे ऊपर से कम्बल आदि से ढक सकते हैं।

मेरु दण्ड स्नान

इसके लिये नल के नीचे बैठकर रीढ़ की हड्डी के ऊपर पानी की धार गिराना चाहिए। अथवा तौलिया को पानी में भिगो कर उससे रीढ़ की हड्डी को रगड़ना चाहिए। इन स्नानों के बाद भीगे शरीर को अच्छी तरह पोंछकर देह में गर्मी लाने के लिये थोड़े समय तक टहलना चाहिए, या हल्का व्यायाम करना चाहिए अथवा ऋतु के अनुकूल हो तो थोड़ी देर तक धूप में रहना चाहिये। स्नान के दो घण्टे पहले और एक घण्टे बाद तक खाना मना है।

गीली चादर लपेटना

ज्वर की अवस्था में अथवा समस्त शरीर में विजातीय द्रव्य के अधिकता होने पर गीली चादर का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है। पहले एक कम्बल को नीचे बिछाकर उस पर एक भीगा और निचोड़ा हुआ साफ चादर फैला दिया जाता है। उस पर रोगी को लिटाकर उसे पूरी तरह उसमें लपेट दिया जाता है, जिससे किसी तरफ होकर बाहरी हवा का आवागमन न हो सके। गर्दन से ऊपर सिर को खुला रखा जाता है। उसके पश्चात् कम्बल को भी ऊपर से उसी प्रकार लपेट दिया जाता है। इस प्रकार पन्द्रह बीस मिनट तक पड़े रहने से पसीना आ जाता है और देह की अतिरिक्त गर्मी निकलकर स्वस्थता का अनुभव होने लगता है।

गीले कपड़े की पट्टी

जब पूरे शरीर के बजाय किसी खास अंग की ही चिकित्सा करने की आवश्यकता होती है तो कपड़े के एक टुकड़े की कई तह करके ठण्डे पानी से भिगोकर उस स्थान पर रख दिया जाता है। जब पट्टी गरम हो जाय तो उसको हटाकर फिर से ठण्डा करके रखा जा सकता है।

ठण्डे पानी की प्रतिक्रिया

इन सब विधियों से जो लाभ होता है उसका मूल कारण ठण्डे पानी की प्रतिक्रिया ही होती है। जिस प्रकार नंगे बदन पर ठंडे पानी के छींटे मारने से फुरफुरी सी आती है और रोंये खड़े हो जाते हैं और उसी के फल से बाद में रक्त संचार की गति तेज हो जाती है। इसी प्रकार उक्त स्नानों और पट्टियों के प्रयोग में जहाँ शीतल पानी का स्पर्श होता है वहाँ पहले तो गर्मी की कमी हो जाती है, पर बाद में उस कमी की पूर्ति के लिए भीतर का रक्त वहाँ खिंच आता है। इस प्रकार जब रक्त की गति तेज होती है तो उसके साथ दूषित विजातीय द्रव्य भी बहकर मलाशय की तरफ ढकेले जाते हैं। इस प्रकार जल के प्रभाव से रोगों का निवारण होता है और सुस्त तथा निर्बल अंगों को नवीन चेतना प्राप्त होती है।

अधिकाँश रोगों की जड़ पेट सम्बन्धी खराबी अथवा कब्ज ही होती है। उसका दूषित विकार नीचे के हिस्से में ही रहता है। कटिस्नान द्वारा इसी भाग को चैतन्य किया जाता है। इससे पुराने और सड़े मल के निकलने में सहायता मिलती है। कठिन अवस्था में कटिस्नान और एनीमा दोनों का एक साथ प्रयोग किया जाता है जिससे शरीर की शुद्धि शीघ्रतापूर्वक होती है। रीढ़ के बीच होकर ही ज्ञान तंतुओं का मुख्य संस्थान है, इसलिए रीढ़ को जलधारा द्वारा अथवा कपड़े की पट्टी द्वारा ठण्डक पहुँचाने से मस्तिष्क की निर्बलता दूर होती है। गीली चादर लपेटने का असर समस्त देह पर पड़ता है और ज्वर, चेचक, रक्त , जिगर, दमा, क्षय, शोथ, खुजली जैसे शरीरव्यापी रोगों पर उसका बहुत हितकारी प्रभाव पड़ता है।

भाप−स्नान

जिस प्रकार ठण्डे और गर्म पानी के प्रयोग से अनेक रोग दूर होते हैं उसी प्रकार भाप के प्रयोग से भी अनेक प्रकार की शारीरिक पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। अगर समस्त शरीर का कोई रोग हो तो उसके लिए किसी लोहे की जाली के पलंग या छिरछिरी बुनी हुई चारपाई पर रोगी को लिटाकर उसके नीचे खौलते हुए पानी के तीन बर्तन रख देने चाहिये और सबके ऊपर से एक बड़ा कम्बल इस प्रकार डाल देना चाहिये कि वह पूर्ण चारपाई को ढ़ककर जमीन को छूता रहे जिससे भाप बाहर न निकल सके। ऐसा करने से थोड़ी देर में खूब पसीना निकलने लगता है जिसके साथ शरीर के बहुत से विकार भी निकल जाते हैं और शरीरव्यापी समस्त दोषों की शुद्धि हो जाती है।

अगर किसी खास अंग पर ही भाप देनी हो तो उसी अंग को भाप निकलते हुए बर्तन के ऊपर रखना चाहिये और ऊपर से किसी कपड़े से इस प्रकार ढक देना चाहिये कि वह अंग तथा बर्तन दोनों उससे ढक जाएँ। यदि ऐसा न हो सके तो खूब गरम पानी में ऊनी कपड़े के दो टुकड़े डाल देने चाहिएं। जिस अंग पर सेंक करना हो उस पर एक मोटा सूती कपड़ा डाल लेना चाहिये। तब पहले एक ऊनी कपड़े को निकाल कर निचोड़ कर दर्द के स्थान पर रख दें। जब वह ठण्डा होने लगे तो उसे हटाकर दूसरे टुकड़े को उसी प्रकार रख दे। सूती कपड़ा डालने का उद्देश्य यह होता है कि सेंक होते समय उस अंग को ठण्डी हवा का झोंका न लगे और दूसरे यदि ऊनी कपड़ा ज्यादा गर्म हो जाय तो उसका असर एकदम त्वचा पर न पड़े।

इन विधियों से या जैसी परिस्थिति हो उसके अनुकूल इनमें कुछ परिवर्तन करके पीड़ित अंगों को भाप से सेंकने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। गर्म स्नान या भाप के उपचार के बाद ठण्डे पानी से नहाने या धोने का भी नियम है जिससे रक्त संचरण की गति ठीक हो जाय।

    ये पोस्ट आपको कैसा लगा बताइएगा ज़रूर क्योंकि मेरी निरंतर ये कोशिश रहती है कि आप सभी स्वस्थ एवम् प्रसन्न रहें l

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