Medicinal Plant -औषधीय पौधा-पारिजात/ हरश्रृंगार

अमृततुल्य औषधी- पारीजात / हरिश्रृंगार
पारीजात समुद्र-मंथन के समय विभिन्न रत्नों के साथ-साथ प्रकट हुआ था, इसलिये इसे देवलोक का वृक्ष भी कहते हैं। इसके फूल अत्यंत सुकुमार व सुगंधित होतै हैं, जो दिमाग को शीतलता व शक्ति प्रदान करते हैं। पारीजात वृक्ष नकारात्मक ऊर्जा को हटाता है तथा इसको छाया में विश्राम करने वाले का बुद्धिबल बढ़ता है। पारीजात के पत्तों का उपयोग वंसत ऋतु मे नहीं करना चाहिए, इस ऋतु में पारीजात के पत्ते गुणहीन होते हैं।
पारीजात वातव्याधी, स्लिप्ड डिस्क, पुराना बुखार, बच्चों के पेट में कृमि, पेट में जलन व सूखी खाँसी, बवासीर, हृदय रोग, त्वचारोग व स्रीरोग में विशेष लाभदायक है।
वातव्याधी:- संधिवात, आमवात, जोड़ों के दर्द में पारीजात की 5-10 पत्तियों को पीसकर 1 गिलास पानी में उबालें, 1 कप बच जाये तो छानकर सुबह खाली पेट 2-3 महीने लगातार सेवन करें। इस प्रयोग से अन्य कारणों से होनेवाली पीड़ा में भी राहत मिलती है।
स्लिप्ड डिस्क व सायटिका :-पारीजात के पत्तों का काढ़ा बनाकर सुबह तथा शाम प्रयोग करने से स्लिप्ड डिस्क व सायटिका में लाभ होता है
पुराना बुखार:- पारीजात के 7-8 कोमल पत्तों के रस में 5-10 मि.ली. अदरक का रस व शहद मिलाकर सुबह शाम लेने से पुराने बुखार में फायदा होता है।
बच्चों के पेट में कृमि:- पारीजात के 7- 8 कोमल पत्तों के रस में थोडा सा गुड़ मिलाकर पिलाने से कृमि मल के साथ बाहर आ जाते हैं या मर जाते हैं।
पेट में जलन व सूखी खाँसी :- पारीजात के पत्तों के रस में मिश्री मिला कर पिलाने से पित्त के कारण होने वाली जलन आदि विकार तथा शहद मिला कर पिलाने से सूखी खाँसी मिटती है।
बवासीर :- पारीजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बवासीर रोग ठीक हो जाता है। पारीजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बवासीर के रोगी को राहत मिलती है।
हृदय रोग :- पारीजात के फूलों का रस 20 मि.ली. प्रतिदिन सेवन करने से हृदयरोग से बचने में मदद मिलती है।
त्वचारोग:- पारीजात के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से त्वचा से सम्बन्धित विकार, दाद व खुजली ठीक हो जाती है।
स्त्रीरोग- पारीजात के फूलों की कलियों का सेवन कालीमिर्च के साथ करने से स्त्री रोगों से सम्बन्धित विकारों में लाभदायक है।

Author: admin

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