Medicinal Plant -औषधीय पौधा-पारिजात/ हरश्रृंगार

अमृततुल्य औषधी- पारीजात / हरिश्रृंगार
पारीजात समुद्र-मंथन के समय विभिन्न रत्नों के साथ-साथ प्रकट हुआ था, इसलिये इसे देवलोक का वृक्ष भी कहते हैं। इसके फूल अत्यंत सुकुमार व सुगंधित होतै हैं, जो दिमाग को शीतलता व शक्ति प्रदान करते हैं। पारीजात वृक्ष नकारात्मक ऊर्जा को हटाता है तथा इसको छाया में विश्राम करने वाले का बुद्धिबल बढ़ता है। पारीजात के पत्तों का उपयोग वंसत ऋतु मे नहीं करना चाहिए, इस ऋतु में पारीजात के पत्ते गुणहीन होते हैं।
पारीजात वातव्याधी, स्लिप्ड डिस्क, पुराना बुखार, बच्चों के पेट में कृमि, पेट में जलन व सूखी खाँसी, बवासीर, हृदय रोग, त्वचारोग व स्रीरोग में विशेष लाभदायक है।
वातव्याधी:- संधिवात, आमवात, जोड़ों के दर्द में पारीजात की 5-10 पत्तियों को पीसकर 1 गिलास पानी में उबालें, 1 कप बच जाये तो छानकर सुबह खाली पेट 2-3 महीने लगातार सेवन करें। इस प्रयोग से अन्य कारणों से होनेवाली पीड़ा में भी राहत मिलती है।
स्लिप्ड डिस्क व सायटिका :-पारीजात के पत्तों का काढ़ा बनाकर सुबह तथा शाम प्रयोग करने से स्लिप्ड डिस्क व सायटिका में लाभ होता है
पुराना बुखार:- पारीजात के 7-8 कोमल पत्तों के रस में 5-10 मि.ली. अदरक का रस व शहद मिलाकर सुबह शाम लेने से पुराने बुखार में फायदा होता है।
बच्चों के पेट में कृमि:- पारीजात के 7- 8 कोमल पत्तों के रस में थोडा सा गुड़ मिलाकर पिलाने से कृमि मल के साथ बाहर आ जाते हैं या मर जाते हैं।
पेट में जलन व सूखी खाँसी :- पारीजात के पत्तों के रस में मिश्री मिला कर पिलाने से पित्त के कारण होने वाली जलन आदि विकार तथा शहद मिला कर पिलाने से सूखी खाँसी मिटती है।
बवासीर :- पारीजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बवासीर रोग ठीक हो जाता है। पारीजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बवासीर के रोगी को राहत मिलती है।
हृदय रोग :- पारीजात के फूलों का रस 20 मि.ली. प्रतिदिन सेवन करने से हृदयरोग से बचने में मदद मिलती है।
त्वचारोग:- पारीजात के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से त्वचा से सम्बन्धित विकार, दाद व खुजली ठीक हो जाती है।
स्त्रीरोग- पारीजात के फूलों की कलियों का सेवन कालीमिर्च के साथ करने से स्त्री रोगों से सम्बन्धित विकारों में लाभदायक है।

Medicinal Plant-Curry Leaves औषधीय पौधा-कड़ी पत्ता

Honey Suckle मधुमालती

मधुमालती

पेड़ पौधे भगवान की बनाई हुई दवाई की जीवित फैक्टरियां है। अपने आस पास ही बाग़ बगीचों में नज़र दौडाएं तो कई लाभदायक जड़ी बूटियाँ मिल जाएंगी। मधुमालती की बेल कई घरों में लगी होंगी इसके फूल और पत्तियों का रस मधुमेह के लिए बहुत अच्छा है।

इसके फूलों से आयुर्वेद में वसंत कुसुमाकर रस नाम की दवाई बनाई जाती है। इसकी 2-5 ग्राम की मात्रा लेने से कमजोरी दूर होती है और हारमोन ठीक हो जाते है। प्रमेह , प्रदर , पेट दर्द , सर्दी-जुकाम और मासिक धर्म आदि सभी समस्याओं का यह समाधान है।

प्रमेह या प्रदर में इसके 3-4 ग्राम फूलों का रस मिश्री के साथ लें।

शुगर की बीमारी में करेला , खीरा, टमाटर के साथ मालती के फूल डालकर जूस निकालें और सवेरे खाली पेट लें या केवल इसकी 5-7 पत्तियों का रस ही ले लें। वह भी लाभ करेगा।

कमजोरी में भी इसकी पत्तियों और फूलों का रस ले सकते हैं।

पेट दर्द में इसके फूल और पत्तियों का रस लेने से पाचक रस बनने लगते हैं। यह बच्चे भी आराम से ले सकते हैं।

सर्दी ज़ुकाम के लिए इसकी एक ग्राम फूल पत्ती और एक ग्राम तुलसी का काढ़ा बनाकर पीयें।

यह किसी भी तरह का नुकसान नहीं करता। यह बहुत सौम्य प्रकृति का पौधा है।

Indian long pepper

पिप्पली (Indian long pepper)

वैदेही,कृष्णा,मागधी,चपला आदि पवित्र नामों से अलंकृत,सुगन्धित पिप्पली भारतवर्ष के उष्ण प्रदेशों में उत्पन्न होती है। वैसे इसकी चार प्रजातियों का वर्णन आता है परन्तु व्यवहार में छोटी और बड़ी दो प्रकार की पिप्पली ही आती है। बड़ी पिप्पली मलेशिया,इंडोनेशिया और सिंगापुर से आयात की जाती है,परन्तु छोटी पिप्पली भारतवर्ष में प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती है। इसका वर्ष ऋतू में पुष्पागम होता है तथा शरद ऋतू में इसकी बेल फलों से लद जाती है। बाजारों में इसकी जड़ पीपला मूल के नाम से मिलती है। यह सुगन्धित,आरोही अथवा भूमि पर फैलने वाली,काष्ठीय मूलयुक्त,बहुवर्षायु,आरोही लता है। इसके फल 2-3 सेमी लम्बे, 2 मिमी चौड़े,कच्चे शहतूत जैसे,किन्तु छोटे व बारीक,पकने पर लाल रंग के व सूखने पर धूसर कृष्ण वर्ण के होते हैं | इसके फलों को ही पिप्पली कहते हैं।
पिप्पली के विभिन्न औषधीय गुण –
1- पिप्पली को पानी में पीसकर माथे पर लेप करने से सिर दर्द ठीक होता है।
2- पिप्पली और वच चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर ३ ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से दो बार दूध या गर्म पानी के साथ सेवन करने से आधासीसी का दर्द ठीक होता है।
3- पिप्पली के 1-2 ग्राम चूर्ण में सेंधानमक,हल्दी और सरसों का तेल मिलाकर दांत पर लगाने से दांत का दर्द ठीक होता है।
4- पिप्पली,पीपल मूल,काली मिर्च और सौंठ के समभाग चूर्ण को 2 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ चाटने से जुकाम में लाभ होता है।
6- पिप्पली चूर्ण में शहद मिलाकर प्रातः सेवन करने से,कोलेस्ट्रोल की मात्रा नियमित होती है तथा हृदय रोगों में लाभ होता है।
6-पिप्पली और छोटी हरड़ को बराबर-बररबर मिलाकर,पीसकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह- शाम गुनगुने पानी से सेवन करने पर पेट दर्द,मरोड़,व दुर्गन्धयुक्त अतिसार ठीक होता है।
7- आधा चम्मच पिप्पली चूर्ण में बराबर मात्रा में भुना जीरा तथा थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर छाछ के साथ प्रातः खाली पेट सेवन करने से बवासीर में लाभ होता है।

Benefits Of Elephant Creeper

विधारा (Elephant Creeper)

विधारा साधारण लता नही एक औषधीय लता है

विधारा को Elephant Creeper, अधोगुडा, घाव बेल, समुद्र सोख,आदि नाम से भी जाना जाता है। विधारा का एक अन्य प्रचलित नाम घावपत्ता भी है। यह पूरे भारत में बहुत आसानी से उपलब्ध है, इसको घरों में बड़े गमलों में लगाया जा सकता है यह वैसे भी निर्जन पड़े स्थानों में आसानी उग आता है । औषधीय प्रयोग के लिए उन्ही पौधों के पत्तो का इस्तेमाल करें जो पौधे धूप में लगे हैं।

विधारा स्वाद में कड़वा, तीखा, कसैला तथा गर्म प्रकृति की एक सदाबहार लता है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग रसायन यानी सातों धातुओं को पुष्ट करने वाले पदार्थ के रूप में किया जाता है। इसका प्रयोग कफ, वात शान्त करता है,पुरुषों में शुक्राणुओं को बढ़ाता है, हड्डियां मजबूत होती हैं,विधारा का जोड़ों का दर्द, गठिया, बवासीर, सूजन, डायबिटीज, खाँसी, पेट के कीड़े, घाव भरने , ब्लीडिंग रोकने, एनीमिया, मिरगी, शारीरिक शक्ति बढ़ाने ,दर्द , दस्त, पेशाब के रोगों ,त्वचा संबंधी रोगों और बुखार आदि में प्रयोग किया जाता है।

इसके पत्तों को तोड़कर निचली सतह को गीले कपडे से पोछ कर साफ़ कर लें जिससे की बारीक रोये निकल जाये अब इस पत्ते को पीसकर रस निचोड़कर लगभग 20-25 ml रस निकाल लें । इस रस को दिन में तीन चार बार पीने से पूरे शरीर में कहीं भी ब्लीडिंग हो रही हो रुक जाती है। कई बार महिलाओं में विभिन्न समस्याओं के कारण Heavy Bleeding होती है तो विधारा का यह प्रयोग काम करता है जब बड़े बड़े डॉक्टर नाकाम हो जाएँ महंगी दवाए अपना असर न करें तो इसको जरूर आजमाएं पहली खुराक से ही आराम मिलेगा इसका कोई भी साइड इफ़ेक्ट नहीं है ।

खूनी बबासीर में भी रक्त के बहाव को उसका प्रयोग लाभकारी है।

शरीर में कहीं भी घाव हो गया हो घाव भर ही न रहा हो महंगे महंगे एंटीबायोटिक्स असफल हो जाएँ तो विधारा के पत्तों की निचली सतह के रेशों को गीले कपडे से पोछ कर साफ़ करके पत्तों को आंच में हल्का गरम करके ऊपर की चिकनी वाली सतह की तरफ से घाव पर बाँध दें, हर सात आठ घंटे पर पत्ते बदलते रहे, पहले दिन से ही लाभ मिलेगा।

लम्बी बीमारी के कारण बिस्तर पर पड़े रहने वाले मरीजो के शरीर में Bed sore हो जाते हैं, कभी कभी तो यह Bed sore रीढ़ की हड्डी तक पहुचने लगते हैं ज्यादा बढ़ जाए तो भयानक दुर्गन्ध आती है , ऐसी अवस्था में विधारा के रस को सर्जिकल कॉटन या गाज पट्टी की सहायता से बार बार लगाये जहाँ पर बाँधने की सुविधा हो तो बाँध भी सकते हैं, कैसा भी Bed sore हो जरुर ठीक होगा।

महिलाओं को सफेद प्रदर यानी ल्यूकोरिया शिकायत होने पर विधारा चूर्ण को ठंडे या सामान्य जल के साथ सेवन करने से सफेद प्रदर में लाभ होता है।

मधुमेह के मरीजों में जूते चप्पल काटने के कारण गैंग्रीन हो जाती है डॉक्टर के पास जाओ तो पहले कुछ दिन दवाई खिलाएंगे दवाओं की खुराक में कुछ हेरफेर करेंगे फिर कहेंगे आप इस ऊँगली को कटवा दे लेकिन बात यहीं नहीं रूकती किसी और ऊँगली में घाव होने के बाद धीरे से किसी दिन वो ऊँगली भी निकाल दी जाती है मरीज बेचारा असहाय हो जाता है मरता क्या न करता वाली हालत होती है कभी किसी बड़े शुगरक्लिनिक पर जाएँ आपको ऐसे मरीज दिख जायेंगे जिनकी तीन चार उंगलिया निकाल दी गयी होती है। इस गैंग्रीन की समस्या में विधारा के पत्ते बड़ा काम करते है।इन्हें गरम करके चिकनी वाली सतह की तरफ से बांधना होता है।

विधारा के पत्तों को रोये वाली सतह की तरफ से घाव पर नहीं बाँधा जाता है। यह सतह फोड़े को पकाने के लिए प्रयोग की जाती है।

विधारा के सेवन की मात्रा

रस – 5-10 मिली
काढ़ा – 15-30 मिली
चूर्ण – 2-4 ग्राम

अधिकता से बचे ,वैद्य की सलाह जरूर लें।

Medicine Plant Careya Arborea

कुम्बी के उपगोग
(Careya arborea)

आज भी जंगलो में कठोर तपस्या करने वाले साधु कुम्भी की छाल का वल्कल(वस्त्र) धारण करते है। इसकी छाल से रस्सियां भी बनाई जाती हैं।

मध्यप्रदेश के जंगलों में मिलने वाले कुम्बी को संस्कृत में कुंभी कहा जाता हैं। पर्णपाती वृक्ष का यह जंगली फल हैं । इसकी ऊँचाई 9 से 18 मीटर तक होती है। इसका अंतकाष्ठ हल्का या गहरे लाल रंग का होता है। लकड़ी भारी तथा कठोर होती है।

कुंबी की लकड़ी का उपयोग कृषि औजारों, आलमारियों, बंदूक के कुंदों, घरों के खंभों और तख्तों के बनाने के काम आता है।
कुंबी का छाल रेशेदार होती है जिसका उपयोग भूरे कागज और जहाजी रस्सों के बनाने में होता है।

औषधीय उपयोग
ग्रामीणांचल में शराब छोड़ने के लिए इसके पत्तो को पीसकर पानी पिलाया जाता है। ग्रामीणांचल में आज भी पशुओं को गिचोड़ी पड़ने पर इसका फल खिलाया जाता हैं।
इसकी छाल ठंड में शामक के रूप में दी जाती है। इसका उपयोग चेचक एवं ज्वरहारी खुजली को नष्ट करने में होता है। फूलों की पर्णयुक्त कलियों में श्लेष्मा होता है। फल सुंगधित और खाद्य होते हैं। इसमें कषाय गोंद पाए जाते हैं। फल का काढ़ा पाचक होता है, बीज विषैले होते हैं। पत्तियों में 19 प्रतिशत टैनिन पाया जाता है।

कुछ जगह इसके फलों की माला बनाकर घर मे लगा दी जाती हैं ताकि जहरीले जन्तु घर मे प्रवेश न करें।

Best Plants For Home Plantation

अपने घर में कौन सा पौधा लगाएं
——————————–
हर व्यक्ति चाहता है कि यदि उसके पास जगह है तो वह अपने घर के बगीचे में तरह तरह के पेड़ पौधे लगाये लेकिन यह भी सच है कि उनमें से कई पेड़ पौधों का घर के आस-पास होना अशुभ माना जाता है और कई ऐसे होते है जो दोष निवारक माने गए हैं। आइए जानें, कौन सा पेड़ लगाना होता है अच्छा और कौन सा है अशुभ

तुलसी :
हिन्दू धर्म में तुलसी के पौधे को एक तरह से लक्ष्मी का रूप माना गया है। कहते है की जिस घर में तुलसी की पूजा अर्चना होती है उस घर पर भगवान श्री विष्णु की सदैव कृपा दृष्टि बनी रहती है । आपके घर में यदि किसी भी तरह की निगेटिव एनर्जी मौजूद है तो यह पौधा उसे नष्ट करने की ताकत रखता है। हां, ध्यान रखें कि तुलसी का पौधा घर के दक्षिणी भाग में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि यह आपको फायदे के बदले काफी नुकसान पहुंचा सकता है।

बेल का वृक्ष :
भगवान शिव को बेल का वृक्ष अत्यंत प्रिय है। मान्यता है इस वृक्ष पर स्वयं भगवान शिव निवास करते हैं। भगवान शिवजी का परम प्रिय बेल का वृक्ष जिस घर में होता है वहां धन संपदा की देवी लक्ष्मी पीढ़ियों तक वास करती हैं। इसको घर में लगाने से धन संपदा की देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और सारे संकट भी दूर होते है ।

शमी का पौधा :
शमी का पौधा घर में होना भी बहुत शुभ माना जाता है । शमी के पौधे के बारे में तमाम भ्रांतियां मौजूद हैं और लोग आम तौर पर इस पौधे को लगाने से डरते-बचते हैं। ज्योतिष में इसका संबंध शनि से माना जाता है और शनि की कृपा पाने के लिए इस पौधे को लगाकर इसकी पूजा-उपसना की जाती है। इसका पौधा घर के मुख्य द्वार के बाईं ओर लगाना शुभ है। शमी वृक्ष के नीचे नियमित रूप से सरसों के तेल का दीपक जलाएं, इससे शनि का प्रकोप और पीड़ा कम होगी और आपका स्वास्थ्य बेहतर बना रहेगा। विजयादशमी के दिन शमी की विशेष पूजा-आराधना करने से व्यक्ति को कभी भी धन-धान्य का अभाव नहीं होता।

अश्वगंधा :
अश्वगंधा को भी बहुत ही शुभ माना जाता है । इसे घर में लगाने से समस्त वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं ।अश्वगंधा का पौधा जीवन में शुभता को बढ़ाकर जीवन को और भी अधिक सक्रिय बनाता है। यह एक अत्यन्त लोकप्रिय आयुर्वेदिक औषधि है।

आंवले का पेड़ :
यदि घर में आंवले का पेड़ लगा हो और वह भी उत्तर दिशा और पूरब दिशा में तो यह अत्यंत लाभदायक है।यह आपके कष्टों का निवारण करता है। आंवले के पौधे की पूजा करने से मनौती पूरी होती हैं।
इसकी नित्य पूजा-अर्चना करने से भी समस्त पापों का शमन हो जाता है।

अशोक का पौधा :
घर में अशोक का पौधा लगाना भी बहुत शुभ माना गया है । अशोक अपने नाम के अनुसार ही शोक को दूर करने वाला और प्रसन्नता देने वाला वृक्ष है। इससे घर में रहने वालों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।

श्वेतार्क :
श्वेतार्क गणपति का पौधा दूधवाला होता है। वास्तु सिद्धांत के अनुसार दूध से युक्त पौधों का घर की सीमा में होना अषुभ होता है। किंतु श्वेतार्क या आर्क इसका अपवाद है। श्वेतार्क के पौधे की हल्दी, अक्षत और जल से सेवा करें। ऐसा करने से इस पौधे की बरकत से उस घर के रहने वालों को सुख शांति प्राप्त होती है। ऐसी भी मान्यता है कि जिसके घर के समीप श्वेतार्क का पौधा फलता-फूलता है वहां सदैव बरकत बनी रहती है। उस भूमि में गुप्त धन होता है या गृह स्वामी को आकस्मिक धन की प्राप्ति होती हैl

गुडहल का पौधा :
गुडहल का पौधा ज्योतिष में सूर्य और मंगल से संबंध रखता है, गुडहल का पौधा घर में कहीं भी लगा सकते हैं, परंतु ध्यान रखें कि उसको पर्याप्त धूप मिलना जरूरी है। गुडहल का फूल जल में डालकर सूर्य को अघ्र्य देना आंखों, हड्डियों की समस्या और नाम एवं यश प्राप्ति में लाभकारी होता है। मंगल ग्रह की समस्या, संपत्ति की बाधा या कानून संबंधी समस्या हो, तो हनुमान जी को नित्य प्रात: गुडहल का फूल अर्पित करना चाहिए। माँ दुर्गा को नित्य गुडहल अर्पण करने वाले के जीवन से सारे संकट दूर रहते है ।

नारियल का पेड़ :
नारियल का पेड़ भी शुभ माना गया है । कहते हैं, जिनके घर में नारियल के पेड़ लगे हों, उनके मान-सम्मान में खूब वृद्धि होती है।

नीम :
घर के वायव्य कोण में नीम केे वृक्ष का होना अति शुभ होता है। सामान्तया लोग घर में नीम का पेड़ लगाना पसंद नहीं करते, लेकिन घर में इस पेड़ का लगा होना काफी शुभ माना जाता है। पॉजिटिव एनर्जी के साथ यह पेड़ कई प्रकार से कल्याणकारी होता है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नीम के सात पेड़ लगाता है उसे मृत्योपरांत शिवलोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति नीम के तीन पेड़ लगाता है वह सैकड़ों वर्षों तक सूर्य लोक में सुखों का भोग करता है।

केले का पौधा :
केले का पौधा धार्मिक कारणों से भी काफी महत्वपूर्ण माना गया है। गुरुवार को इसकी पूजा की जाती है और अक्सर पूजा-पाठ के समय केले के पत्ते का ही इस्तेमाल किया जाता है। इसे भवन के ईशान कोण में लगाना चाहिए, क्योंकि यह बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधि वृक्ष है।इसे ईशान कोण में लगाने से घर में धन बढ़ता है। केले के समीप यदि तुलसी का पेड़ भी लगा लें तो अधिक शुभकारी रहेगा। इससे विष्णु और लक्ष्मी की कृपा साथ-साथ बनी रहती है। कहते हैं इस पेड़ की छांव तले यदि आप बैठकर पढ़ाई करते हैं तो वह जल्दी जल्दी याद भी होता चला जाता है।

बांस का पौधा :
बांस का पौधा घर में लगाना अच्छा माना जाता है। यह समृद्धि और आपकी सफलता को ऊपर ले जाने की क्षमता रखता है।सामान्यता दूध या फल देने वाले पेड़ घर पर नहीं लगाने चाहिए, लेकिन नारंगी और अनार अपवाद है । यह दोनों ही पेड़ शुभ माने गए है और यह सुख एवं समृद्धि के कारक भी माने गए है । धन, सुख समृद्धि और घर में वंश वृद्धि की कामना रखने वाले घर के आग्नेय कोण (पूरब दक्षिण) में अनार का पेड़ जरूर लगाएं। यह अति शुभ परिणाम देता है।वैसे अनार का पौधा घर के सामने लगाना सर्वोत्तम माना गया है । घर के बीचोबीच पौधा न लगाएं। अनार के फूल को शहद में डुबाकर नित्यप्रति या फिर हर सोमवार भगवान शिव को अगर अर्पित किया जाए, तो भारी से भारी कष्ट भी दूर हो जाते हैं और व्यक्ति तमाम समस्याओं से मुक्त हो जाता है।

Benefits Of Leaves

बेहद शुभ और लाभकारी पत्ते

कई ऐसे पत्ते होते हैं जिनका प्रयोग पूजा के दौरान जरूर किया जाता है और सनातन धर्म में इन पत्तों का विशेष महत्व बताया गया है। इन पत्तों को बेहद ही शुभ माना जाता है और पूजा करते समय भगवान को ये पत्ते जरूर चढ़ाए जाते हैं। शास्त्रों में ऐसे ही कुछ विशेष पत्तों की जानकारी दी गई है और आज हम आपके साथ ये जानकारी साझा करने जा रहे हैं।

तुलसी का पत्ता

भगवान विष्णु को तुलसी का पत्ता बेहद ही प्रिय है और इस पत्ते का भोग भगवान को जरूर लगाया जाता है। तुलसी के पौधे को शास्त्रों में बेहद ही पवित्र बताया गया है और इस पौधे के साथ कई प्रकार के औषधिया गुण भी जुड़े हुए हैं। इस पत्ते को खाने से कई रोग सही हो जाते हैं। अगर इसे पानी में डाल दिया जाए तो पानी शुद्ध हो जाता है। हालांकि तुलसी का पत्ता भूलकर भी भगवान शिव और गणेश जी को अर्पित ना करें। इन दोनों भगवानों को ये पत्ता अर्पित करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है।

बिल्वपत्र

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उन्हें बिल्व अथवा बेल जरूर चढ़ाएं। ऐसा माना जाता है कि शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढ़ाने से हर कामना पूरी हो जाती है और धन की प्राप्ति होती है। वहीं बिल्वपत्र में भी कई प्रकार के औषधिय गुण होते हैं और इसे खाने से पाचन क्रिया सही बनीं रहती है। हालांकि आप बिल्वपत्र को चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, अमावस्या और संक्राति के दिन ना तोड़ने ऐसा करने से आप पाप के भाग्यदारी बन जाते हैं।

केले के पत्ते

केले के पेड़ को पवित्र और शुभ माना जाता है और कई तरह के धार्मिक कार्यों जैसे हवन, विवाह और इत्यादि में इस पत्ते का प्रयोग किया जाता है। इस पेड़ पर लगने वाला फल यानी केला भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को जरूर चढ़ाया जाता है। इसके अलावा गुरुवार के दिन इस पेड़ की पूजा करने से गुरु ग्रह शांत भी रहता है। शास्त्रों में इस पेड़ को पूजनीय पेड़ का दर्जा दिया गया है।

आम के पत्ते

मंडप और कलश को सजाने के लिए आम के पत्ते का प्रयोग जरूर किया जाता है। इस पेड़ के पत्ते शाक्तिशाली माने जाते हैं और यहीं कारण है कि इस पेड़ के पत्तों को द्वार, दीवार, यज्ञ आदि स्थानों पर रखा जाता है। ताकि नकारात्मक शक्तियां इनसे दूर रहे सके। पत्ते के अलावा इस पेड़ की लकड़ियां भी पवित्र मानी जाती हैं और हवन में इनका प्रयोग किया जाता है।

शमी के पत्ते

शमी के पेड़ का उल्लेख भी शास्त्रों में किया गया है और शास्त्रों के अनुसार इस पेड़ की पूजा करने से विजय की प्राप्ति होती है। बुधवार के दिन गणेश जी को शमी के पत्ते जरूर अर्पित करने चाहिए। वहीं इस पेड़ की पूजा दशहरे पर खास तौर पर की जाती है। इसके अलावा आयुर्वेद में भी शमी के वृक्ष को महत्वपूर्ण वृक्ष माना गया है।

पीपल का पत्ता

पीपल के पेड़ पर विष्णु जी का वास माना जाता है और हिंदू धर्म में इस पेड़ के पत्तों का खासा महत्व है। शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से

Medicinal Plants

पौधों का औषधीय महत्व
कुदरत के दिये गये वरदानों में पेड़-पौधों का महत्वपूर्ण स्थान है। पेड़-पौधे मानवीय जीवन चक्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिकानिभाते हैं। इसमें न केवल भोजन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ती ही होती बल्कि जीव जगत से नाजुक संतुलन बनाने में भी ये आगे रहते हैं-कार्बन चक्र हो या भोजना श्रृंखला के पिरामिड में भी ये सर्वोच्च स्थान ही हासिल करते हैं। इनकी उपयोगिता को देखते हुए इनको अनेक संवर्गों में बांटा गया है। इनमें औषधीय पौधे न केवल अपना औषधीय महत्व रखते हैं आय का भी एक जरिया बन जाते हैं। हमारे शरीर को निरोगी बनाये रखने में औषधीय पौधों का अत्यधिक महत्व होता है यही वजह है कि भारतीय पुराणों, उपनिषदों, रामायण एवं महाभारत जैसे प्रमाणिक ग्रंथों में इसके उपयोग के अनेक साक्ष्य मिलते हैं। इससे प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटियों के माध्यम से न केवल हनुमान ने भगवान लक्ष्मण की जान बचायी बल्कि आज की तारीख में भी चिकित्सकों द्वारा मानव रोगोपचार हेतु अमल में लाया जाता है। यही नहीं, जंगलों में खुद-ब-खुद उगने वाले अधिकांश औषधीय पौधों के अद्भुत गुणों के कारण लोगों द्वारा इसकी पूजा-अर्चना तक की जाने लगी है जैसे तुलसी, पीपल, आक, बरगद तथा नीम इत्यादि। प्रसिध्द विद्वान चरक ने तो हरेक प्रकार के औषधीय पौधों का विश्लेषण करके बीमारियों में उपचार हेतु कई अनमोल किताबों की रचना तक कर डाली है जिसका प्रयोग आजकल मानव का कल्याण करने के लिए किया जा रहा है।

  • औषधीय पेड़–पौधे,जड़ी-बूटियां और उनके वानस्पतिक नाम
  • नीम (Azadirachta indica)

एक चिपरिचित पेड़ है जो 20 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है इसकी एक टहनी में करीब 9-12 पत्ते पाए जाते है। इसके फूल सफ़ेद रंग के होते हैं और इसका पत्ता हरा होता है जो पक्क कर हल्का पीला–हरा होता है।अक्सर ये लोगो के घरों के आस-पास देखा जाता है।

  • तुलसी (ocimum sanctum):

तुलसी एक झाड़ीनुमा पौधा है। इसके फूल गुच्छेदार तथा बैंगनी रंग के होते हैं तथा इसके बीज घुठलीनुमा होते है। इसे लोग अपने आंगन में लगाते हैं ।

  • ब्राम्ही/ बेंग साग (hydrocotyle asiatica):

यह साग पानी की प्रचुरता में सालो भर हरी भरी रहने वाली छोटी लता है जो अक्सर तालाब या खेत माय किनारे पायी जाती है। इसके पत्ते गुदे के आकार (1 /2 -2 इंच) के होते हैं। यह हरी चटनी के रूप में आदिवासी समाज में प्रचलित है ।

ब्राम्ही (cetella asiatica):

यह अत्यंत उपयोगी एवं गुणकारी पौधा है । यह लता के रूप में जमीन में फैलता है। इसके कोमल तने 1-3 फीट लम्बी और थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठ होती है। इन गांठो से जड़े निकलकर जमीन में चली जाती है। पत्ते छोटे,लम्ब,अंडाकार,चिकने,मोटे हरे रंग के तथा छोटे–छोटे होते हैं सफ़ेद हल्के नीले गुलाबी रंग लिए फूल होते हैं। यह नमी वाले स्थान में पाए जाते हैं ।

  • 5 .हल्दी (curcuma longa):

हल्दी के खेतों में तथा बगान में भी लगया जाता है। इसके पत्ते हरे रंग के दीर्घाकार होते हैं।इसका जड़ उपयोग में लाया जाता है। कच्चे हल्दी के रूप में यह सौन्दर्यवर्द्धक है।सुखे हल्दी को लोग मसले के रूप में इस्तेमाल करे हैं। हल्दी रक्तशोधक और काफ नाशक है ।

  • 6 . चिरायता / भुईनीम (Andrographis paniculata):

छोटानागपुर के जगलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला 1-3 फीट तथा उसकी अनेक शाखाएँ पतली–पतली होती है। इसकी पत्तियां नुकीली, भालाकर, 3-4 इंच लम्बी तथा एक से सवा इंच चौड़ी होती है। फूल छोटे हल्के गुलाबी और सफ़ेद रंग के होते हैं यह बरसात के दिनों में पनपता है और जाड़े में फल तथा फूल लगते हैं। यह स्वाद में कड़वा होता है ।

  • अडूसा:

यह भारत के प्रायः सभी क्षेत्रो में पाया जाता है।अडूसा का पौधा यह सालों भर हरा भरा रहनेवाला झाड़ीनुमा पौधा है जो पुराना होने पर 8-10 फीट तक बढ़ सकता है।इसकी गहरे हरे रंग की पत्तियां 4-8 इंच लम्बी और 1-3 इंच चौड़ी है। शरद ऋतू के मौसम में इसके अग्र भागों के गुच्छों में हल्का गुलाबीपन लिए सफ़ेद रंग के फूल लगते हैं।

  • 8 . सदाबहार (Catharanthus roseus):
  • यह एक छोटा पौधा है जो विशेष देखभाल के बिना भी रहता है।सदाबहार का पौधा चिकित्सा के क्षेत्र में इसका अपना महत्त्व है।इसकी कुछ टहनियां होती है और यह 50 सेंटी मीटर ऊंचाई तक बढ़ता है। इसके फूल सफ़ेद या बैगनी मिश्रित गुलाबी होते हैं।यह अक्सर बगान, बलुआही क्षेत्रो, घेरों के रूप में भी लगया जाता है ।
  • सहिजन / मुनगा(Moringa oleifera):
  • सहिजन एक लोकप्रिय पेड़ है।जिसकी ऊंचाई 10 मीटर या अधिक होतीसहिजन है । इसके छालों में लसलसा गोंद पाया जाता है। इसके पत्ते छोटे और गोल होते हैं तथा फूल सफेद होते हैं।इसके फूल पते और फल (जोकी) खाने में इस्तेमाल में लाये जाते हैं। इसके पत्ते (लौह) आयरन के प्रमुख स्रोत हैं जो गर्भवती माताओं के लिए लाभदायक है ।
  • हडजोरा

हड्जोरा /अमृता एक लता है।इसके पत्ते गहरे हरे होते हैं

रंग के तथा हृदयाकार होते हैं।मटर के दानो के आकार के इसके फल कच्चे में हरे हाड़जोड़ा
तथा पकने पर गहरे लाल रंग होते हैं।यह लता पेड़ों , चाहरदीवारी या घरों के छतों पर आसानी से फैलती है।इसके तने से पतली पतली जड़ें निकल कर लटकती है । हडजोरा का यह प्रकार गहरे हरे रंग में पाया जाता है।ये गुठलीदार तथा थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठे होती है।इसके पत्ते बहुत छोटे होते हैं।जोड़ों के दर्द तथा हड्डी के टूटने तथा मोच आने पर इसका इस्तेमाल किये जाने के कारण इसे हडजोरा के नाम से जाना जाता है ।

  • करीपत्ता (Maurraya koengii):

करीपत्ता का पेड़ दक्षिण भारत में प्रायः सभी घरों में पाया जाता है। इसका इस्तेमाल करी का पौधा मुख्यता भोजन में सुगंध के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं।इसके पत्तों का सुगंध बहुत तेज़ होता है।इसकी छाल गहरे धूसर रंग के होती है इसके पत्ते अंडाकार, चमकीले और हरे रंग के होते हैं।इसके फूल सफ़ेद होते हैं एवं गुच्छेदार होते हैं।इसके फल गहरे लाल होते हैं जो बाद में बैगनी मिश्रित कालापन लिए होता है ।

दूधिया घास (Euphorbia hirat)

यह साधरणतः खेतों, खलिहानों, मैदानों में घासों के साथ पाया जाता है।दुधिया धास इसके फूल बहुत छोटे होते हैं जो पत्तों के बीच होते हैं।यह स्वाद में कडुवा होता है।इसकी छोटी टहनियों जी तोड़ने पर ढूध निकलता है जो लसलसा होता है ।

  • मीठा घास(Scoparia dulcis ):

यह बगान, खेतों के साथ पाया जाता है।इसके पत्ते छोटे होते हैं और फल छोटे-छोटे होते हैं जो राइ के दाने के बराबर देखने में लगते हैं।स्वाद में मीठा होने के कारण मीठा घास के रूप में जाना जाता है ।मीठा धास

  • भुई आंवला (phyllanthus niruri):

यह एक अत्यंत उपयोगी पौधा है जो बरसात के मौसम में यहाँ-* जनमते हैं। इस पौधे की ऊंचाई 1- 25 इंच ऊँचा तथा कई शाखाओं वाले होते हैं। पत्तियां आकार में आंवले की पत्तियों की सी होती है और निचली सतह पर छोटे छोटे गोल फल पाए जाते हैं।यह जाड़े के आरंभ होते होते पक जाते हैं और फल तथा बीज पककर झड जाते हैं और पौधे समाप्त होते हैं ।

  • अड़हुल (Hisbiscus rosasinensis):

अड़हुल का फूल लोगो के घरों में लगाया जाता है।यह दो प्रकार का होता है – लाल और सफ़ेद जो दवा के काम में लाया जाता है।अड़हुल का पत्ता गहरा हरा होता है।

  • घृतकुमारी/ घेंक्वार (Aloe vera):

यह एक से ढाई फूट ऊँचा प्रसिध्द पौधा है।इसकी ढाई से चार इंच चौड़ी,नुकीली एवं कांटेदार किनारों वाली पत्तियां अत्यंत मोटी एवं गूदेदार होती है पत्तियों में हरे छिलकेके नीचे गाढ़ा, लसलसा रंगीन जेली के सामान रस भरा होता है जो दवा के रूप में उपयोग होता है ।

  • महुआ (madhuka indica):

महुआ का वृक्ष 40-50 फीट ऊँचा होता है।इसकी छाल कालापन लिए धूसर रंग की तथा अन्दर से लाल होती है।इसके पत्ते 5- 9 इंच चौड़े होते हैं।यह अंडाकार,आयताकार, शाखाओं के अग्र भाग पर समूह में होते हैं। महुआ के फूल सफ़ेद रसीले और मांसल होते हैं।इसमे मधुर गंध आती है। इसका पका फल मीठा तथा कच्चा में हरे रंग का तथा पकने पर पीला या नारंगी रंग का होता है ।

  • दूब घास ( cynodon dactylon):

दूब घास 10 -40 सेंटी मीटर ऊँचा होता है।इसके पत्ते 2- 10 सेंटी मीटर भुई आवंला

लम्बे होते है इसके फूल और फल सालों भर पायी जाती है।दूब घास दो प्रकार के होते हैं – हरा और सफ़ेद हरी दूब को नीली या काली दूब भी कहते है

  • आंवला (Phyllanthus emblica):

इसका वृक्ष 5-10 मीटर ऊँचा होता है ।आंवला स्वाद में कटु, तीखे, खट्टे, मधुर , आवंला

और कसैले होते हैं।अन्य फलों की अपेक्षा आंवले में विटामिन सी की मात्रा अधिक

होती है।उसके फूल पत्तीओं के नीचे गुच्छे के रूप में होती है।इनका रंग हल्का हरा तथा सुगन्धित होता है इसके छाल धूसर रंग के होते हैं।इसके छोटे पत्ते 10 – 13 सेंटी मीटर लम्बे टहनियों के सहारे लगा रहता है इसके फल फरवरी –मार्च में पाक कर तैयार हो जाते हैं जो हरापन लिए पिला रहता है ।

  • पीपल (Ficus religiosa):

पीपल विशाल वृक्ष है जिसकी अनेक शाखाएँ होती है।इनके पत्ते गहरे हरे रंग के हृदय आकार होती है।इनके जड़ , फल , छाल , जटा , दूध सभी उपयोग में लाये जाते हैं।हमारे भारत में पीपल का धार्मिक महत्त्व है ।

  • लाजवंती/लजौली (Mimosa pudica):

लाजवंती नमी वाले स्थानों में जायदा पायी जाती है इसके छोटे पौधे में अनेक शाखाएं होती है।इनके पत्ते को छूने पर ये सिकुड़ कर आपस में सट जाती है।इस कारण इसी लजौली नाम से जाना जाता है इसके फूल गुलाबी रंग के होते हैं ।

  • करेला (Mamordica charantia):

यह साधारणतया व्यव्हार में लायी जाने वाली उपयोगी हरी सब्जी है जो लतेदार होती है।इसका रंग गहरा हरा तथा बीज सफ़ेद होता है।पकने पर फल का रंग पिला तथा बीज लाल होता है।यह स्वाद में कड़वा होता है ।

  • पिपली (Piperlongum):

साधारणतया ये गरम मसले की सामग्री के रूप में जानी जाती है।पिपली की कोमल लताएँ 1-2 मीटर जमीन पर फैलती है ये गहरे हरे रंग के चिकने पत्ते 2-3 इंच लम्बे एवं 1-3 चौड़े हृदयाकार के होते हैं।इसके कच्चे फल पीले होते हैं तथा पकने पर गहरा हरा फिर काला हो जाता है।इसके फलों को ही पिपली कहते हैं ।

  • अमरुद (Psidium guayava):

अमरुद एक फलदार वृक्ष है।यह साधारणतया लोगों के घर के आंगन में पाया जाता है इसका फल कच्चा में हरा और पकने पर पिला हो जाता है।प्रकार – यह सफ़ेद और गुलाबी गर्भ वाले होते हैं।इसके फूल सफ़ेद रंग के होते हैं।यह मीठा कसैला , शीतल स्वादिस्ट फल है जो आसानी से उपलब्ध होता है ।

  • कंटकारी/ रेंगनी (Solanum Xanthocarpum):

यह परती जमीन में पाए जाने वाला कांटेदार हलकी हरी जड़ी है।इसके कांटेदार पौधे 5- 10 सेंटी मीटर लम्बी होती है।इसके फूल बैंगनी रंग के पाए जाते हैं।इसके फल के भीतर असंख्य बीज पाए जाते हैं ।

  • जामुन (Engenia jambolana):

जामुन एक उत्तम फल है।गर्मी के दिनों में जैसा आम का महत्व है वैसे ही इसका महत्व गर्मी के अंत मिएँ तथा बरसात में होता है।यह स्वाद में मीठा कुछ खट्टा कुछ कसैले होते हैं।जामुन कर रंग गहरा बैंगनी होता है ।

  • इमली (Tamarindus indica):

इमली एक बड़ा वृक्ष है जिसके पत्ते समूह में पाए जाते हैं जो आंवले के पत्ते की तरह छोटे होते हैं।इसका फल आरंभ में हरा पकने पर हल्का भूरा होता है यह स्वाद में खट्टा होता है

  • अर्जुन (Terminalia arjuna):

यह असंख्य शाखाओं वाला लम्बा वृक्ष है।इसके पत्ते एकदूसरे के विपरीत दिशा में होते हैं।इसके फूल समूह में पाए जाते हैं।तथा फल गुठलीदार होता है जिसमें पांच और से पंख की तरह घेरे होते हैं ।

  • बहेड़ा (Terminalia belerica):

बहेड़ा का पेड़ 15- 125 फीट ऊँचा पाया जाता है, इसका ताना गोल एवं आकार में लम्बा , 8 -35 फीट तक के घेरे वाला होता है।इसकी छाल तोड़ी कालिमा उक्त भूरी और खुरदुरी होती है।इसके फल, फूल, बीज, वृक्ष की छाल , पत्ते तथा लकड़ी सभी दवा के काम में आते हैं ।

  • हर्रे (Terminalia chebula):

यह एक बड़ा वृक्ष है।इसके फल कच्चे में हरे तथा पकने पर पीले धूमिल रंग के होते हैं।इसके फल शीत काल में लगते हैं जिसे जनवरी – अप्रैल में जमा किया जाता है।इसके छाल भूरे रंग के होते हैं।इसके फूल छोटे, पीताभ तथा फल 1-2 इंच लम्बे , अंडाकार होते हैं ।

  • मेथी (Trigonella foenum):

यह लोकप्रिय भाजिओं में से एक है। इनके गुणों के कारण इसका उपयोग प्रत्यक घर में होता है।इस पौधे की ऊंचाई 1- 1 ½ फीट होती है , बिना शाखाओं के।मेथी की भाजी तीखी, कडवी, और वायुनाशक है।छोटानागपुर में इसे सगों के साथ मिला कर खाने में इस्तेमाल किया जाता है ।इसमें लौह तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ।

  • सिन्दुआर/ निर्गुण्डी (Vitex negundo):

यह झड़ी दार पौधा जो कभी कभी छोटा पेड़ का रूप ले लेता है।इसके पत्ते 5 -10 सेंटीमीटर लम्बी तथा छाल धूसर रंग का होता है इसके फूल बहुत छोटे और नीलेपन लिए बैंगनी रंग के होते हैं जो गुच्छे दार होते हैं इसके फाल गुठलीदार होते हैं जो 6 मिलीमीटर डाया मीटर से कम होते हैं और ये पकने पर काले रंग के होते हैं ।

  • चरैयगोडवा (Vitex penduncularis):

इसका पेड़ 10 – 18 मीटर ऊँचा होता है इसके तीन पत्ते एक साथ पाए जाते हैं। जो देखने में चिड़िया के पर की तरह लगते हैं इसलिए इसे चरैयगोडवा कहते हैं। इसके फूल सफ़ेद है।पीलापन के लिए * जो अप्रैल –जून माह में मिलते हैं।इसके फल अगस्त- सितम्बर माह में पाए जाते हैं ।

  • बैर (ज़िज्य्फुस jujuba):

बैर का वृक्ष कांटेदार होता है। इसके कांटे छोटे छोटे होते हैं तथा इसकी पतियाँ गोलाकार तथा गहरे हरे रंग की होती है।इसके फल कच्चे में हरे रंग तथा पकने पर लाल होते हैं।यह स्वाद में खट्टा मीठा तथा कसैला होता है ।

  • बांस (Bambax malabaricum):

बांस साधारणतया घर के पिछवाड़े में पाया जाता है यह 30 -50 मीटर ऊँचा बढ़ता है इसके पत्ते लम्बे और नुकीले होते हैं बांस में थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठे होती है

  • पुनर्नवा / खपरा साग (Boerhavia diffusa):

यह आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण वनौषधि है। पुनर्नवा के ज़मीन पर फैलने वाले छोटी लताएँ जैसे पौधे बरसात में परती जमीन , कूड़े के ढेरों , सड़क के किनारे , जहाँ –तहां स्वयं उग जाते हैं।गर्मीयों में यह प्राय: सुख जाते हैं पर वर्षा में पुन: इसकी जड़ से नयी शाखाएँ निकलती है।पुनर्नवा का पौधा अनेक वर्षो तक जीवित रहता है।पुनर्नवा की लता नुमा हल्के लाल एवं काली शाखाएं 5- 7 फीट तक लम्बी जो जाती है पुनर्नवा की पत्तियां 1 – 1 ¼ इंच लम्बी ¾ – 1 इंच चौड़ी, मोटी ( मांसल) और लालिमा लिए हरे रंग की होती है।फूल छोटे छोटे हल्के गुलाबी रंग के होते हैं।पुनर्नवा के पत्ते और कोमल शाखाओं को हरे साग के रूप में खाया जाता है।इसे स्थानीय लोग खपरा साग के रूप से जानते हैं ।

  • सेमल (Bombax malabaricum):

सेमल के पेड़ बडे मोटे तथा वृक्ष में कांटे उगे होते हैं इसकी शाखाओं में 5- 7 के समूह में पत्ते होते हैं।जनवरी –फ़रवरी के दौरान इसमें फूल आते हैं।जिसकी पंकुधियाँ बड़ी तथा इनका रंग लाल होता है बैशाख में फल आते हैं जिनके सूखने पर रूई और बीज निकलते है ।

  • पलाश (Butea fondosa):

पलाश के पेड़ 5 फीट से लेकर 15-20 फीट या ज्यादा ऊँचे भी होते हैं।इसके एक ही डंठल में तीन पत्ते एक साथ होते हैं।बसंत ऋतू में इसमे केसरिया लाल राग के फूल लगते हैं तब पूरा वृक्ष दूर से लाल दिखाई देता है ।

  • पत्थरचूर (Coleus aromaticus):

यह 1 मीटर ऊंचाई तक बढ़ता है।इसके पत्ते अन्य पत्तों की अपेक्षा कुछ मोटे चिकने और ह्र्द्याकार होती है।इसके फूल सफ़ेद या हल्के बैंगनी रंग के पाए जाते हैं ।

  • सरसों (Sinapis glauca):

सरसों खेतों और बागानों में विस्तृत रूप से खेती किया जाने वाला पौधा है।इस पौधे की ऊंचाई 1.5 मीटर तक होती है।इसके पते के आकार नुकिलेदार होते हैं। तथा फूल पीले रंग में तथा बीज को तेल निकालने के लिए इस्तमाल में लाते हैं ।

  • चाकोड़ (Cassia obtusifolia):

चाकोड़ स्थानीय लोगो में चकंडा के नाम से प्रसिद्ध है।इसके पत्ते अंडाकार होते हैं। तथा फूल छोटे और पीले रंग के होते हैं।इसके फल (बीजचोल) लम्बे होते है।चाकोड़ 1 मीटर तक ऊँचा होता है।यह सड़क किनारे, परती जमीन में पाया जाता है।

  • मालकांगनी/ कुजरी (Celastrus paniculatus):

यह झाड़ीनुमा लातेय्दर* और छोटे टहनियों के साथ पाया जाता है जो व्यास में (डायमीटर) 23 सेंटी मीटर और तक ऊंचाई 18 मीटर होती है। इसके पत्ते दीर्घाकार,अंडाकार और द्न्तादेदार* होते हैं।इसके फूल हरापन लिए पिला होता है।जिसका व्यास 3.8 मिली मीटर होता है। इसके बीज पूर्णतया नारंगी लाल बीजचोल के साथ लगे होते हैं ।

  • दालचीनी (Cinnamonum cassia):

यह मधुर, कडवी सुघंधित होती है।इस वृक्ष की छाल उपयोगी होती है।इसे गर्म मसले के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।

  • शतावर (Asparagus racemosus):

यह बहुत खुबसूरत झाड़ीनुमा पौधा है।जिसे लोग सजाने के कम में भी लाते हैं।इसके पत्ते पतले , नुकिलेदार हरे-भरे होते हैं।इसके फूल देखने में बहुत छोटे – छोटे , सफ़ेद रंग के सुगन्धित होते हैं।इसके फल हरे रंग के होते है जो पकने पर काले रंग के हो जाते हैं।इसकी जड़ आयुर्वेद के क्षेत्र में उपयोगी है जो इस्तेमाल में लायी जाती है ।

  • अनार (punica granatum):

अनार झाड़ीनुमा पतली टहनियों वाला होता है। एक्स फूल लाल रंग का होता है।अनार स्वाद में मीठा , कसैलापन लिए हुए रहता है।इसके फल लाल और सेफ प्रकार के होते हैं। एक्से फूल फल तथा छिलका उपयोग में लाये जाते हैं ।

  • अशोक (Saraca indica):

यह सदाबहार वृक्ष है जो अत्यंत उपयोगी है। इसके पते सीधे लम्बे और गहरे रंग के होते हैं।इसे लोग शोभा बदने के लिए लगते है।इसके छाल धूसर रंग,स्पर्श करनी में कुर्दारी तथा अन्दर लाल रंग की होती है।यह स्वाद में कडवा , कसैला , पचने में हल्का रुखा और शीतल होता है ।

  • अरण्डी/ एरण्ड (Ricinus communis):

यह 7-10 फीट ऊँचा होता है। इसके पत्ते चौड़े तथा पांच भागों में बटें होते अरण्ड के पत्ते फूल बीज और तेल उपयोग में लाये जाते हैं।इसके बीजों का विषैला तत्त्व निकल कर उपयोग में लाये जाते हैं। यह दो प्रकार लाल और सफ़ेद होते हैं ।

  • कुल्थी/ कुरथी (Dolichos biflorus):

यह तीन पत्तीओं वाला पौधा होता है जिसमे सितम्बर- नवम्बर में फूल तथा अक्टूबर-दिसम्बर के बीच फल आते हैं।कुरथी कटु रस वाली,कसैली होती है।यह गर्म, मोतापनासक, और पथरी नासक है ।

  • डोरी (Bassia latifolia):

यह महुआ का फल है इसे तेल बनाने के काम में लाया जाता है इसकी व्याख्या आगे की गई है ।

  • चिरचिटी( Achyranthes aspera) :

एक मीटर या अधिक ऊँचा होता है।इसके पत्ते अंडाकार होते हैं इसके फूल 4-6 मिलीमीटर लम्बे , सफेद्पन लिए हुए हरे रंग या बैगनी रंग के होते हैं ।

  • बबूल (Acacia arabica):

बबूल का वृक्ष मध्यमाकार , कांटे दार होता है।इसके पत्ते गोलाकार और छोटे छोटे होते हैं।पत्तों में भी कांटे होते है इसके फूल छोटे गोलाकार और पीले रंग के होते हैं।इसकी फलियाँ लम्बी और कुछ मुड़ी हुई होती है। बबूल का गोंद चिकित्सा की दृष्टी से उपयोगी है।

  • कटहल (Artocarpus integrifolia):

कटहल के पेड़ से सभी परिचित हैं। इसका फल बहुत बड़ा होता है। कभी-कभी इसका वजन 30 किलो से भी ज्यादा होता है।स्थानीय लोगो में सब्जी और फल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके पेड़ की ऊंचाई 10 मीटर या उससे अधिक हो सकती है।यह एक छाया दर वृक्ष है। इसकी अनेक शाखाएँ फैली होती है ।

04-औषधीय पौधा पीपल

वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत:
पादप
विभाग:
सपुष्पक
वर्ग:
मैग्नोलियोप्सीडा
गण:
रोज़ेलेस
कुल:
मोरेसी
वंश:
फाइकस
जाति:
F. religiosa

संस्कृत भाषा में पिप्पलः, अश्वत्थः आदि दो दर्जन से अधिक नाम हैं । हिन्दी – पीपल, पीपली । गुजराती – पीप्पलो, पीपुलजरी । बंगाली – अश्वत्थ, असुद, असवट । पंजाबी – भोर, पीपल । तामील – अचुक्तम्, अटास, अरशमरस, अस्वत्तम्, कुजीरावनम् इत्यादि । तेलगू – अश्वथ्यम्, बोधि, रावीचेट्ट आदि । फारसी – दरख्त-तेरजो, अंग्रेजी – Pipal tree लेटिन – Ecus Religiuse.

पीपल को देववृक्ष भी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में पीपल का वृक्ष काटना या कटवाना मना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पीपल सभी वृक्षों में अपने गुणों की वजह से सर्वश्रेष्ठ है। यह 24 पहर दूषित गैस कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर प्राणवायु ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है। इसकी छाया शीतल होती है। पीपल के स्पर्श या इसके नीचे बैठने मात्र से जीव तनावमुक्त होकर, मन चेतन और प्रसन्न हो जाता है।

पीपल का धार्मिक महत्‍व के साथ साथ आयुर्वेद में इसका खास महत्‍व है। कई बीमारियों का उपचार इस पेड़ से हो जाता है। गोनोरिया, डायरिया, पेचिश, नसों का दर्द, नसों में सूजन के साथ झुर्रियों की समस्‍या से निजात पाने के लिए इस पेड़ का प्रयोग कीजिए। एंटीऑक्‍सीडेंट युक्‍त यह पेड़ हमारे लिए बहुत फायदेमंद है।पीलिया, रतौंधी, मलेरिया, खाँसी और दमा तथा सर्दी और सिर दर्द में पीपल की टहनी, लकड़ी, पत्तियों, कोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

पीपल की जड़ों में एंटीऑक्सीडेंट सबसे ज्यादा पाए जाते हैं। इसके इसी गुण के कारण यह वृद्धावस्था की तरफ ले जाने वाले कारकों को दूर भगाता है। इसके ताजी जड़ों के सिरों को काटकर पानी में भिगोकर पीस लीजिए, इसका पेस्‍ट चेहरे पर लगाने से झुर्रियां से झुटकारा मिलता है।

पीपल की 10 ग्राम छाल, कत्था और 2 ग्राम काली मिर्च को बारीक पीसकर पाउडर बना लीजिए, नियमित रूप से इसका मंजन करने से दांतों का हिलना, दांतों में सड़न, बदबू आदि की समस्‍या नहीं होती है और यह मसूड़ों की सड़न को भी रोकता है।

पीपल की छाल के अन्दर का भाग निकालकर इसे सुखा लीजिए, और इसे महीन पीसकर इसका चूर्ण बना लें, इस चूर्ण को दमा रोगी को देने से दमा में आराम मिलता है।

पीपल के 4-5 कोमल, नरम पत्ते खूब चबा-चबाकर खाने से, इसकी छाल का काढ़ा बनाकर आधा कप मात्रा में पीने से दाद, खाज, खुजली जैसे चर्म रोगों में आराम होता है।

पैरों की फटी पड़ी एड़ियों पर पीपल के पत्‍ते से दूध निकालकर लगाने से कुछ ही दिनों फटी एड़ियां सामान्य हो जाती हैं और तालु नरम पड़ जाते हैं।

पीपल के कोमल पत्तों को छाया में सुखाकर उसे अच्‍छे से पीस लीजिए, इसे आधा लीटर पानी में एक चम्मच चूर्ण डालकर काढ़ा बना लें। काढ़े में पीसी हुई मिश्री मिलाकर कुनकुना करके पीने से नजला-जुकाम से राहत मिलती है।

इसे पित्‍त नाशक माना जाता है, यानी यह पेट की समस्‍या जैसे – गैस और कब्‍ज से राहत दिलाता है। पित्‍त बढ़ने के कारण पेट में गैस और कब्‍ज होने लगता है। ऐसे में इसके ताजे पत्‍तों के रस एक चम्‍मच सुबह-शाम लेने से पित्‍त का नाश होता है।

पीपल के पत्तों में से जो दूध निकलता है उसको आंख में लगाने से नेत्र वेदना में आराम मिलता है।

पीपल और वट वृक्ष की छाल दिनों को समान मात्रा में मिला कर जल में पका कर कुल्ला करने से दांतों के रोगों में लाभ मिलता है।

पीपल की ताजी टहनी से रोज दातुन करने से दांत मजबूत होते है और मसूड़ों की सूजन खत्म हो जाती है। एवं मुँह से आने वाली दुर्गन्ध भी खत्म हो जाती है।

पीपल के आधा चम्मच पके फलों का चूर्ण शहद के साथ मिला कर खाने से हकलाहट में लाभ मिलता है।

पीपल के 3-4 नए पत्तों को मिश्री के साथ 250 मिली पानी मे बारीक पीसकर घोलकर छान लें। यह शर्बत पीलिया के रोगी को दिन में 2 बार पिलाये। इसका प्रयोग 3-5 दिन करें। पीलिया के लिए रामबाण औषधि है।