01-औषधीय पौधा तुलसी

जगत पादप (Plantae)
वर्ग ऍस्टरिड्स (Asterids)
गण लैमिएल्स (Lamiales)
कुल लैमिएसी (Lamiaceae)
जाति ओसिमम (Ocimum)
प्रजाति O. tenuiflorum (टेनूईफ्लोरम)
द्विपद नाम ऑसीमम सैक्टम

आयुर्वेद में तुलसी को उसके महान् गुणों के कारण ही संजीवनी बूटी के समान माना जाता है। भारतीय संस्कृति में तुलसी का धार्मिक महत्व के साथ साथ विज्ञान के दृष्टिकोण से तुलसी एक सर्वश्रेष्ठऔषधि है। तुलसी को हजारों वर्षों से विभिन्न रोगों के इलाज के लिए औषधि के रूप में प्रयोग किया जा रहा हैं।श्री तुलसी जिसकी पत्तियाँ हरी होती हैं तथा कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियाँ निलाभ-कुछ बैंगनी रंग लिए होती हैं।इसके प्रभाव से मानसिक शांति घर में सुख समृद्धि और जीवन में अपार सफलताओं का द्वार खुलता है। यह ऐसी रामबाण औषधी है जो हर प्रकार की बीमारियों में काम आती है जैसे -हृदय रोग, कैंसर रोग , स्मरण शक्ति, कफ व श्वास के रोग, खॉसी, जुकाम, दमा, दंत रोग आदि में चमत्कारी लाभ मिलता है। तुलसी एक प्रकार से सारे शरीर का शोधन करने वाली जीवन शक्ति संवर्धक औषधि है। यह वातावरण का शोधन कर पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त करती है और हमें शुद्ध प्राणवायु देती है। तुलसी की तमाम प्रजातियां होती है लेकिन मुख्यता 5 प्रजातियां औषधीय रूप में की जाती है……..

  • (1) श्याम तुलसी
  • (2)रामा तुलसी
  • (3) वन तुलसी
  • (4) नींबू तुलसी
  • (5)श्वेत/विष्णु तुलसी,
  • जिसमें मुख्य मुख्य रूप से औषधीय गुण, धर्म की दृष्टि से श्याम तुलसी ज़्यादा प्रभावशाली है, श्याम तुलसी को औषधीय रूप से श्रेष्ठ माना गया है, परन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि दोनों ही गुणों में समान हैं। इसके अतिरिक्त ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है। आपके आंगन में लगा छोटा सा तुलसी का पौधा, अनेक गम्भीर बीमारियो का इलाज करने व उनकी रोकथाम करने में सक्षम हैं।

तुलसी के पांचों प्रकारों को मिलाकर इनका अर्क निकाला जाए, तो यह पूरे विश्व की सबसे प्रभावकारी और बेहतरीन दवा है। एक एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी- बैक्टीरियल, एंटी-वायरल, एंटी-फ्लू, एंटी-बायोटिक, एंटी-इफ्लेमेन्ट्री व एंटी – डिजीज की तरह कार्य करने लगती है।

प्रतिदिन 4- 5 बार तुलसी की 6-8 पत्तियों को चबाने से कुछ ही दिनों में माइग्रेन की समस्या में आराम मिलने लगता है।

तुलसी व अदरक का रस बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से खांसी में बहुत जल्दी आराम मिलता है।

तुलसी के रस में मुलहटी व थोड़ा-सा शहद मिलाकर लेने से खांसी की परेशानी दूर हो जाती है।

चार-पांच लौंग भूनकर तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर लेने से खांसी में तुरंत लाभ होता है।

शिवलिंगी के बीजों को तुलसी और गुड़ के साथ पीसकर नि:संतान महिला को खिलाया जाए तो जल्द ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।

किडनी की पथरी में तुलसी की पत्तियों को उबालकर बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित 6 माह सेवन करने से पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाती है।

फ्लू रोग में तुलसी के पत्तों का काढ़ा, सेंधा नमक मिलाकर पीने से लाभ होता है।

तुलसी थकान मिटाने वाली एक औषधि है। बहुत थकान होने पर तुलसी की पत्तियों और मंजरी के सेवन से थकान दूर हो जाती है।

तुलसी के रस में थाइमोल तत्व पाया जाता है। इससे त्वचा के रोगों में लाभ होता है।

तुलसी के पत्तों को त्वचा पर रगड़ दिया जाए तो त्वचा पर किसी भी तरह के संक्रमण में आराम मिलता है।

तुलसी के पत्तों को तांबे के पानी से भरे बर्तन में डालें। कम से कम एक-सवा घंटे पत्तों को पानी में रखा रहने दें। यह पानी पीने से कई बीमारियां पास नहीं आतीं।

दिल की बीमारी में यह अमृत है। यह खून में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करती है। दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों को तुलसी के रस का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।

Author: admin

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